बेल बजी तो ललिता ने कम्मो से कहा, 'देखो जरा, पापा तो नहीं आए?'
कम्मो ने दरवाजा खोला और वह भौंचक सी, सहमी सी परे हटी। ललिता को लांघ कर अंदर चली गई।
'कौन है रे?' ललिता का सवाल उसके कान तक पहुंचा ही नहीं। दो कदम आगे बढ़ कर ललिता ने बाहर नज़र दौडायी। अचानक उसकी नज़र जम गई। बदन में झुरझुरी सी होने लगी। बाहर राजेश खड़ा था, ललिता का पति। और उसके साथ एक औरत थी। राजेश ने उस औरत के गले में बांह डाल कर रखी थी। देखते ही पता चल रहा था कि वह पूरी तरह टुन्न है। सदमा इतना भयंकर और दर्दनाक था कि ललिता बुत बन कर खड़ी कि खड़ी रह गई। राजेश ने झूलते हुए दहलीज के अंदर कदम रखा और उसका संतुलन बिगड गया। लड़खड़ाते राजेश को देख कर ललिता जान गई कि इस पियक्कड ने आज नशे में सारी हदें पार कर दी हैं। चार बच्चियों का यह बाप बेशर्म और बेमुरव्वत बन कर पता नहीं किस रंडी को घर ले आया है।
अंदर की तरफ जाते हुए राजेश ने ललिता को धक्का दिया तो ललिता ने लड़खडाकर गिरते गिरते सोफे का सहारा लिया। कम्मो- ललिता की बड़ी बेटी ने आगे बढ़ कर ललिता को सहारा दिया। न ललिता कुछ बोल पा रही थी और न कम्मो।
'अरे इसे उठा ले जा, उठा ले जा इस कचरे को.....' बेडरूम से आवाज आई और ललिता लपक कर बेडरूम के दरवाजे तक पहुंची। बिजली की तरह मन में खयाल कौंधा, ये कहीं हमारे बिस्तर पर....। ललिता को संभलने में देर हुई थी। राजेश और वह औरत बिस्तर पर पसर गए थे। राजेश ने बच्ची की लगभग गठरी बना कर बिस्तर से बाहर कर हाथ में लटका कर पकड़ रखा था। अपने आप पर उसका वश नहीं था। बच्ची अगर... मन में विचार आने से पहले शरीर में हरकत हुई और उसके हाथ से ललिता ने बच्ची की गठरी ले ली। राजेश ने हिकारत से कहा, 'लड़कियां ही लड़कियां.. एक के बाद एक लड़कियां....थूः!'
ललिता इस पर कोई प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं थी। ऐसी ढेरों फब्तियां वह आए दिन पचाती रहती थी। हर रोज... सास से, पति से, देवरानी से... जेठानी-ननद से, पडोसियों से....पूरे समाज से.....
एक ही बेडरूम का तो घर था। बाहरवाले कमरे में बिछे काऊच पर ललिता बैठी रही। गोद में बैठी बच्ची कुनमुनायी तो ललिता जागी। उसे बाथरूम ले गई। लौट कर उसे कोच पर सुलाया। चद्दर उढाई। सब आदत से। इतने में किसीके जोर से रोने की आवाज आई। ललिता चौंकी। कम्मो अपने बिस्तर पर उठ बैठी। दोनों आतंकित थीं। अंदर गुड्डी और छुटकी थीं। बेडरूम में। दिमाग में हालात जैसे ही साफ हुए ललिता लपकी। पीछे आ रही कम्मो को वहीं रोक कर ललिता ने बेडरूम के दरवाजे को पीटना शुरू किया। उस औरत ने आकर दरवाजा खोला। तीर की तरह ललिता अंदर घुसी। गुड्डी अपने बिस्तर पर लेटी थी और रो रही थी। ललिता को देखते ही वह अपने बिस्तर से नीचे कूदी और ‘मम्मी’ कह कर मुझसे लिपट गई। उसका रोना लगातार जारी था। इतने में राजेश जाग गया। हिकारत भरी आवाज में फुफकारते हुए बोला, 'ले जा, बाहर अपनी लौंडिया को। खाली-पिली कटकट..।'
गुड्डी और छुटकी को लेकर ललिता फिर ड्रॉइंग रूम में लौटी। बच्ची के साथ छुटकी को काऊच पर सुलाया। गुड्डी कम्मो के साथ उसके बिस्तर में सिमट कर सो गई। ललिता वहीं कुर्सी से सिर टिका कर बैठी। सारी संज्ञाएं चेतनाशून्य थीं, दिमाग एकदम खाली था।
कुछ देर बाद बेडरूम का दरवाजा खोल कर वह औरत बाहर निकली। उसने आप ही गुसलखाना ढूंढा। बाहर आई तो लगा उसने हाथ-मुंह धो लिए थे। ललिता के सामने आकर वह खड़ी हो गई। नज़रें उसी पर टिकी होने के बावजूद ललिता उसे देख नहीं पा रही थी। अजीब हालत थी ललिता की, जैसे खुद को ही कोस रही थी। जो कुछ हो रहा था उसके लिए ललिताने अपने आप को ही गुनहगार करार दिया था शायद।
'कुछ खाने को मिलेगा?' उस औरत ने पूछा।
ललिता अचकचाई! उसे भूख लगी थी!
चुपचाप उठ कर ललिता रसोई में गई। दो रोटियां, दाल, साग थाली में परोस कर उसे दिया। ललिता के पीछे पीछे चल कर वह भी रसोई में पहुंची थी। दीवार से पीठ टिका कर वह जमीन पर ही पालथी मार कर बैठी और शांत भाव से खाना खाने लगी। ललिता अपनी ही रसोई में पराई होकर खड़ी रही। खाना खाकर उसने पानी पिया फिर ललिता की ओर देखते हुए वह बोली,
'हर रोज क्या ऐसाईच.....?'
कठपुतली की तरह ललिता की गर्दन ना में हिली।
उसने पूछा, 'तो क्या आज पहली बार...?'
ललिता की गर्दन 'हां' में हिली।
उसके मुंह से भद्दी गाली निकली। वह कुछ देर तक चुप रही। फिर गला खंकार कर बोली, 'देख तू औरत है....अच्छी औरत है इसलिए बोलती है। तेरी चार चार बेटियां हैं। ये मर्द का जात बडा हरामी होताए। उसको बेटी नई मंगता, उसको खाली औरत मंगता.....'
-संध्या पेडणेकर
*औरत चाहिए, बेटी नहीं
picture - peperonity.com

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