घर के कामों में कोई रुपी का हाथ नहीं पकड़ सकता था। सारे काम वह फटाफट निपटाती जाती। घर के जिस कमरे से वह होकर गुजरती उस कमरे में देर तक उसकी खुशबू तैरती रहती। बेहद सफाईपसंद, खाना बनाने में माहिर, बीमारों की देख-रेख में तत्पर, बड़ो की सेवा-चाकरी में हरदम आगे... किसी भी काम के लिए आप बेझिझक रूपी को पुकार लें, वह हमेशा मुस्कुराती हुई हाजिर होती और बस, काम तो हुआ ही समझिए। शरीर पर फैली यौवन की लुनाई ने उसे खूबसूरत बना दिया था लेकिन दुबारा मुड़ कर कोई देखे ऐसा उसका रूप नहीं था। पढ़ाई-लिखाई से वह बेमन थी। कहती, पढ़ना चाहती तो हूं दी, लेकिन दिमाग में कुछ घुसता ही नहीं, क्या करूं। दसवीं के बाद उसने घर का कामकाज सम्हाल लिया और पक्की गृहस्थिन बन कर वह मां की जिम्मेदारी उठाने लगी। मोहल्ले के लोग कहते, लड़की को घर बिठा कर रम्मी-रूपी की मम्मी खूब चकरघिन्नी की तरह घूमती-फिरती रहती है, लेकिन रुपी की मम्मी को इससे कोई फर्क नहीं पडता था। अपनी उम्र जीने का मौका खुद उसकी अपनी बेटी ने उसे दिया था।
रम्मी यानी रूपी की बड़ी बहन। उन दोनों के बीच दो भाई भी थे। उन दोनों की उम्र में वैसे तो सिर्फ चार-पांच वर्ष का अंतर था, लेकिन उनके रहन-सहन में जमीन-आसमान का फर्क था।
रम्मी थी चंट, बेबाक, फैशनेबुल कपडे पहननेवाली, तेजतर्रार मिजाजवाली और मेधावी भी। कालेज के आखिरी वर्ष में वह पढ़ रही थी और लड़कों में उसकी दिलचस्पी उनके मोहल्लेवालों में ही नहीं वरन् पूरे शहर में मशहूर थी। उसके कई बॉयफ्रेंडस् थे। खास कर उसके एक मुसलमान बॉयफ्रेंड के कारण वह ज्यादा मशहूर हुई थी। गुस्से में आकर कभी दादी बेटे से शिकायत करते हुए कहती, हिंदु लड़की और मुसलमान लड़का। शहर में रहते हैं इसलिए कोई खुले आम बोलता नहीं, लेकिन इस तरह के रिश्ते लड़कियों की ज़िंदगी पर साये की तरह ताउम्र मंडराते रहते हैं। अभी वक्त नहीं बीता, संभाल ले उसे।
ऐसा नहीं कि रम्मी के बाबा यह बात नहीं जानते हों, लेकिन वे मजबूर थे। रम्मी के साथ जोर-जबर्दस्ती नहीं की जा सकती यह वे खूब अच्छी तरह जानते थे। एक बात उन्होंने घरवालों को पता नहीं लगने दी थी, उस मुसलमान लड़के की एक और गर्लफ्रेंड थी और रम्मी से बात करने पर उसने बताया था कि वह भी उसकी खास गर्लफ्रेंड ही थी। मन ही मन सिर पीटते हुए वह सोचते रह गए थे कि खास गर्लफ्रेंड के क्या मायने होते होंगे भला।
एक दिन उस दूसरी लड़की की माताजी उनके गाराज में उनसे मिलने आईं। बड़ी चिंता में थीं वह और उनके कहने पर ही रम्मी के पापा उनके साथ उस लड़के के माता-पिता से मिलने गए थे। दोनों ने हाथ जोड़ कर विनति की थी कि आप अपने लड़के की लगाम कस कर रखिए, उससे कहिए कि वह इन दोनों लड़कियों से दूरी बनाए रखे। लेकिन लड़के के घरवालों के कान प रजूं नहीं रेंगी थी। अमीरी के रौब में उन्होंने कहा था, आपकी बेटियां ही उसके पीछे पड़ी होंगी। अमीर लड़कों को आपके जैसे गरीब घर की लड़कियां फांसने की कोशिश तो करती ही हैं। सम्हाल कर रखिए अपनी लड़कियों को अपने घर। हमारे बेटे की शिकायत करने के बजाय अपनी बच्चियों को घर बिठाइए, अच्छे घरों में ब्याह दीजिए और छुट्टी कर लीजिए। पढ़-लिख कर करेंगी क्या वे? आखिर चूल्हा ही फूंकना है उन्हें। दोनों अपना-सा मुंह लेकर लौटे थे वहां से।
उन दोनों की अपने ब्वॉयफ्रेंड के घर जाने की बात पता चलने पर रम्मी ने घर पर तमाशा खड़ा किया सो अलग। उसकी दलील बड़ी विचित्र थी। उसका कहना था, यही तो उम्र है हमारी यह सब करने की, बूढ़े होने पर तो हम यह सब नहीं कर सकते। और तो और उसने पिता को सुनाया था कि, बाबा, वह तो मुसलमान है, मैं उसके साथ शादी कैसे कर सकती हूं? शादी तो मैं उसी लड़के से करूंगी जिसे आप पसंद कर लाएंगे। लेकिन तब तक मुझे पढ़ना है और ज़िंदगी के मजे लूटने हैं, डैम इट। पैर पटकते हुए जब रम्मी कमरे से बार निकल गई तो दादी ने जैसे फैसला सुना दिया। दादी ने कहा, 'कल से रिश्ते देखना शुरू करो, और जितनी जल्दी हो सके इन दोनों मुसीबतों को विदा कर दो। पता चला कि, बड़ी की वजह से कल को कोई छोटी के साथ ब्याह करने को राजी न हो।' रम्मी के बाबा ने अपनी मां की कही बात मानी। प्रेम की अंतिम परिणति शादी होती है इस बात को मानने वाले पिता के लिए रम्मी का बर्ताव और उसकी सोच बड़ा जबरदस्त धक्के थे।
रम्मी देखने में भी ठीक-ठाक थी और चंटपने के कारण और स्मार्ट लगती थी। पहली बार उसे जो वरपक्ष देखने आया वहीं उसकी शादी तय हुई। पढ़ा-लिखा लड़का बड़े शहर में रहता था। अच्छी कंपी में ऊंचे ओहदे पर था। तगडी तनखाह थी और घर से भी अमीर खानदान के लोग थे। उन्हें रम्मी इस कदर पसंद आयी कि, एक पैसा दहेज में न देने की और फाइनल एक्जाम पूरी होने तक शादी न करने की रम्मी की शर्त भी उन्होंने मान ली। रम्मी की शादी अब उसके घरवालों के लिए दोगुने टेंशनवाली बात बन गई क्योंकि वह अपने पुराने बॉयफ्रेंड से भी मिलती और अपने भावी पति से भी मिलती।
रूपी की शादी तय होना जरा मुश्किल लग रहा था। वैसे तो उनकी जाति व्यापारियों की थी लेकिन इधर उनकी जाति में भी पढी-लिखी लड़कियों की मांग बढ़ गई थी और रूप के साथ साथ रूपी का केस इस मामले में भी बेहद कमजोर था। आखिर काफी कुछ देने की बात मान कर उसकी शादी भी तय कर दी गई।
रम्मी तब अपने बाबा से, दादी से और मां से खूब लडी थी। दहेज की मांग करनेवाले घर में अपनी बहन की शादी हो यह उसे कत्तई रास नहीं आया था। लेकिन तब ज़िंदगी में पहली बार रूपी अपनी बहन से भिड गई थी। उसका कहना था, बाबा-मां के सिर से बोझ उतर रहा है जैसे तैसे तो हो जाने दे मेरी शादी। निपट लूंगी मैं अपने नसीब से, ये लोग तो खुश रहें। फिर दोनों बहनें एक-दूसरे से गले मिल कर खूब रोई थीं।
आखिर, 'इससे अच्छा तो आप उसके गले में पत्थर बांध कर उसे कुएं में ढकेल दीजिए...' कहते हुए वह पैर पटकती हुई वहां से चली गई थी।
और फिर एक ही मंटप में एक तरफ लेन-देन, मान-मनौवल, ताम-झाम आदि के साथ छोटी की और दूसरी तरफ हंसी-खुशी बड़ी की शादियां संपन्न हुईं। दोनों लड़कियां मायके से विदा लेकर ससुराल चली गईं। घरवालों को भी धीरे धीरे उनके बगैर जीने की आदत होने लगी।
लेकिन एक दिन अचानक रूपी मायके लौट आई। उसका पूरा शरीर अपराधबोध से झुका हुआ था। मां और दादी से लिपट कर वह खूब रोई। कहा कि, बहुत मिस किया आप सभी लोगों को इसलिए चली आई। लेकिन मां और दादी ने ताड ही लिया कि मामला कुछ और है। रुपी के बदन पर के चोट के निशान चीख चीख कर हालात बयान कर रहे थे। रूपी ने पल्लू से ढंक रखा था लेकिन उसका एक गाल सूजा हुआ था। उसके नीचे के होंठ पर जख्म की पपडी जमी हुई थी। लग रहा था, साडी से ढंका उसका जिस्म पूरी तरह लहूलुहान है।
सबके पूछते रहने के बावजूद वह बस रोती रही, कहा कुछ नहीं। तीन-चार दिन बीत जाने के बाद जब बाबा ने कुछ ज्यादा ही जोर देकर पूछा तो रूपी ने बिलखते हुए कहा कि, पहले दिन से ही उसके ससुरालवालों ने उस पर कहर ढ़ाना शुरू किया था। किसी न किसी बहाने से उसकी अंदाधुंध मारपीट की जाती। हर रोज वे उस पर मायके से और पैसा लाने की मांग करते और वह इनकार करती या प्रतिवाद करती तो उसकी बेरहमी से पिटाई करते। उन लोगों को रम्मी के मुसलमान बॉयफ्रेंड के बारे में भी पता चला था। उनका कहना था कि जिस लड़की की बड़ी बहन इस तरह आवारागर्दी करती हो उस लड़की को वे अपने खानदान की बहू बना कर नहीं रख सकते। आखिर एक दिन पति उसे धोखे से मायके तक ले आया। दरवाजे से बाहर उसे रिक्शे से उतारा और धमकाया कि अब वापिस नहीं आना और किसी भी मामले में मेरा या हमारे घरवालों का नाम मत लेना। वरना देख लूंगा.... और आओ तो रुपयों की पोटली लेकर ही आना। वरना....।
फर्राटे से रिक्शा निकल गया था और तभी भाई की रूपी पर नज़र पड़ी थी। उसे रुपी के आने की खुशी थी। वह सम्मान के साथ उसे घर के अंदर लिवा लाया था और रुपी आते ही नानी के गले लग कर फूट पड़ी थी।
महीने भर में रुपी की हालत में थोड़ा सुधार आया और पता चला कि वह पेट से है। ससुराल लौटने के बजाय अपनी मर्जी से रुपी ने अपने शरीर पर और जख्म झेले। ज़िंदगी से खाए थपेड़ों ने रुपी को इतना सयाना बना दिया कि उसने नर्सिंग का कोर्स कर दीन-दुखियों की सेवा करते हुए अपने पैरों पर खड़े होने का निर्णय लिया।
दो साल बाद रम्मी की जच्चगी उसीकी देखरेख में हुई।
-संध्या पेडणेकर
रम्मी यानी रूपी की बड़ी बहन। उन दोनों के बीच दो भाई भी थे। उन दोनों की उम्र में वैसे तो सिर्फ चार-पांच वर्ष का अंतर था, लेकिन उनके रहन-सहन में जमीन-आसमान का फर्क था।
रम्मी थी चंट, बेबाक, फैशनेबुल कपडे पहननेवाली, तेजतर्रार मिजाजवाली और मेधावी भी। कालेज के आखिरी वर्ष में वह पढ़ रही थी और लड़कों में उसकी दिलचस्पी उनके मोहल्लेवालों में ही नहीं वरन् पूरे शहर में मशहूर थी। उसके कई बॉयफ्रेंडस् थे। खास कर उसके एक मुसलमान बॉयफ्रेंड के कारण वह ज्यादा मशहूर हुई थी। गुस्से में आकर कभी दादी बेटे से शिकायत करते हुए कहती, हिंदु लड़की और मुसलमान लड़का। शहर में रहते हैं इसलिए कोई खुले आम बोलता नहीं, लेकिन इस तरह के रिश्ते लड़कियों की ज़िंदगी पर साये की तरह ताउम्र मंडराते रहते हैं। अभी वक्त नहीं बीता, संभाल ले उसे।
ऐसा नहीं कि रम्मी के बाबा यह बात नहीं जानते हों, लेकिन वे मजबूर थे। रम्मी के साथ जोर-जबर्दस्ती नहीं की जा सकती यह वे खूब अच्छी तरह जानते थे। एक बात उन्होंने घरवालों को पता नहीं लगने दी थी, उस मुसलमान लड़के की एक और गर्लफ्रेंड थी और रम्मी से बात करने पर उसने बताया था कि वह भी उसकी खास गर्लफ्रेंड ही थी। मन ही मन सिर पीटते हुए वह सोचते रह गए थे कि खास गर्लफ्रेंड के क्या मायने होते होंगे भला।
एक दिन उस दूसरी लड़की की माताजी उनके गाराज में उनसे मिलने आईं। बड़ी चिंता में थीं वह और उनके कहने पर ही रम्मी के पापा उनके साथ उस लड़के के माता-पिता से मिलने गए थे। दोनों ने हाथ जोड़ कर विनति की थी कि आप अपने लड़के की लगाम कस कर रखिए, उससे कहिए कि वह इन दोनों लड़कियों से दूरी बनाए रखे। लेकिन लड़के के घरवालों के कान प रजूं नहीं रेंगी थी। अमीरी के रौब में उन्होंने कहा था, आपकी बेटियां ही उसके पीछे पड़ी होंगी। अमीर लड़कों को आपके जैसे गरीब घर की लड़कियां फांसने की कोशिश तो करती ही हैं। सम्हाल कर रखिए अपनी लड़कियों को अपने घर। हमारे बेटे की शिकायत करने के बजाय अपनी बच्चियों को घर बिठाइए, अच्छे घरों में ब्याह दीजिए और छुट्टी कर लीजिए। पढ़-लिख कर करेंगी क्या वे? आखिर चूल्हा ही फूंकना है उन्हें। दोनों अपना-सा मुंह लेकर लौटे थे वहां से।
उन दोनों की अपने ब्वॉयफ्रेंड के घर जाने की बात पता चलने पर रम्मी ने घर पर तमाशा खड़ा किया सो अलग। उसकी दलील बड़ी विचित्र थी। उसका कहना था, यही तो उम्र है हमारी यह सब करने की, बूढ़े होने पर तो हम यह सब नहीं कर सकते। और तो और उसने पिता को सुनाया था कि, बाबा, वह तो मुसलमान है, मैं उसके साथ शादी कैसे कर सकती हूं? शादी तो मैं उसी लड़के से करूंगी जिसे आप पसंद कर लाएंगे। लेकिन तब तक मुझे पढ़ना है और ज़िंदगी के मजे लूटने हैं, डैम इट। पैर पटकते हुए जब रम्मी कमरे से बार निकल गई तो दादी ने जैसे फैसला सुना दिया। दादी ने कहा, 'कल से रिश्ते देखना शुरू करो, और जितनी जल्दी हो सके इन दोनों मुसीबतों को विदा कर दो। पता चला कि, बड़ी की वजह से कल को कोई छोटी के साथ ब्याह करने को राजी न हो।' रम्मी के बाबा ने अपनी मां की कही बात मानी। प्रेम की अंतिम परिणति शादी होती है इस बात को मानने वाले पिता के लिए रम्मी का बर्ताव और उसकी सोच बड़ा जबरदस्त धक्के थे।
रम्मी देखने में भी ठीक-ठाक थी और चंटपने के कारण और स्मार्ट लगती थी। पहली बार उसे जो वरपक्ष देखने आया वहीं उसकी शादी तय हुई। पढ़ा-लिखा लड़का बड़े शहर में रहता था। अच्छी कंपी में ऊंचे ओहदे पर था। तगडी तनखाह थी और घर से भी अमीर खानदान के लोग थे। उन्हें रम्मी इस कदर पसंद आयी कि, एक पैसा दहेज में न देने की और फाइनल एक्जाम पूरी होने तक शादी न करने की रम्मी की शर्त भी उन्होंने मान ली। रम्मी की शादी अब उसके घरवालों के लिए दोगुने टेंशनवाली बात बन गई क्योंकि वह अपने पुराने बॉयफ्रेंड से भी मिलती और अपने भावी पति से भी मिलती।
रूपी की शादी तय होना जरा मुश्किल लग रहा था। वैसे तो उनकी जाति व्यापारियों की थी लेकिन इधर उनकी जाति में भी पढी-लिखी लड़कियों की मांग बढ़ गई थी और रूप के साथ साथ रूपी का केस इस मामले में भी बेहद कमजोर था। आखिर काफी कुछ देने की बात मान कर उसकी शादी भी तय कर दी गई।
रम्मी तब अपने बाबा से, दादी से और मां से खूब लडी थी। दहेज की मांग करनेवाले घर में अपनी बहन की शादी हो यह उसे कत्तई रास नहीं आया था। लेकिन तब ज़िंदगी में पहली बार रूपी अपनी बहन से भिड गई थी। उसका कहना था, बाबा-मां के सिर से बोझ उतर रहा है जैसे तैसे तो हो जाने दे मेरी शादी। निपट लूंगी मैं अपने नसीब से, ये लोग तो खुश रहें। फिर दोनों बहनें एक-दूसरे से गले मिल कर खूब रोई थीं।
आखिर, 'इससे अच्छा तो आप उसके गले में पत्थर बांध कर उसे कुएं में ढकेल दीजिए...' कहते हुए वह पैर पटकती हुई वहां से चली गई थी।
और फिर एक ही मंटप में एक तरफ लेन-देन, मान-मनौवल, ताम-झाम आदि के साथ छोटी की और दूसरी तरफ हंसी-खुशी बड़ी की शादियां संपन्न हुईं। दोनों लड़कियां मायके से विदा लेकर ससुराल चली गईं। घरवालों को भी धीरे धीरे उनके बगैर जीने की आदत होने लगी।
लेकिन एक दिन अचानक रूपी मायके लौट आई। उसका पूरा शरीर अपराधबोध से झुका हुआ था। मां और दादी से लिपट कर वह खूब रोई। कहा कि, बहुत मिस किया आप सभी लोगों को इसलिए चली आई। लेकिन मां और दादी ने ताड ही लिया कि मामला कुछ और है। रुपी के बदन पर के चोट के निशान चीख चीख कर हालात बयान कर रहे थे। रूपी ने पल्लू से ढंक रखा था लेकिन उसका एक गाल सूजा हुआ था। उसके नीचे के होंठ पर जख्म की पपडी जमी हुई थी। लग रहा था, साडी से ढंका उसका जिस्म पूरी तरह लहूलुहान है।
सबके पूछते रहने के बावजूद वह बस रोती रही, कहा कुछ नहीं। तीन-चार दिन बीत जाने के बाद जब बाबा ने कुछ ज्यादा ही जोर देकर पूछा तो रूपी ने बिलखते हुए कहा कि, पहले दिन से ही उसके ससुरालवालों ने उस पर कहर ढ़ाना शुरू किया था। किसी न किसी बहाने से उसकी अंदाधुंध मारपीट की जाती। हर रोज वे उस पर मायके से और पैसा लाने की मांग करते और वह इनकार करती या प्रतिवाद करती तो उसकी बेरहमी से पिटाई करते। उन लोगों को रम्मी के मुसलमान बॉयफ्रेंड के बारे में भी पता चला था। उनका कहना था कि जिस लड़की की बड़ी बहन इस तरह आवारागर्दी करती हो उस लड़की को वे अपने खानदान की बहू बना कर नहीं रख सकते। आखिर एक दिन पति उसे धोखे से मायके तक ले आया। दरवाजे से बाहर उसे रिक्शे से उतारा और धमकाया कि अब वापिस नहीं आना और किसी भी मामले में मेरा या हमारे घरवालों का नाम मत लेना। वरना देख लूंगा.... और आओ तो रुपयों की पोटली लेकर ही आना। वरना....।
फर्राटे से रिक्शा निकल गया था और तभी भाई की रूपी पर नज़र पड़ी थी। उसे रुपी के आने की खुशी थी। वह सम्मान के साथ उसे घर के अंदर लिवा लाया था और रुपी आते ही नानी के गले लग कर फूट पड़ी थी।
महीने भर में रुपी की हालत में थोड़ा सुधार आया और पता चला कि वह पेट से है। ससुराल लौटने के बजाय अपनी मर्जी से रुपी ने अपने शरीर पर और जख्म झेले। ज़िंदगी से खाए थपेड़ों ने रुपी को इतना सयाना बना दिया कि उसने नर्सिंग का कोर्स कर दीन-दुखियों की सेवा करते हुए अपने पैरों पर खड़े होने का निर्णय लिया।
दो साल बाद रम्मी की जच्चगी उसीकी देखरेख में हुई।
-संध्या पेडणेकर

