Tuesday, August 10, 2010

3. रामकहानी

                                                 - संध्या पेडणेकर

`आप कहाँ उतरेंगी बहनजी?'
सवाल के साथ कंधे पर हुए स्पर्श ने तारा की तन्द्रा तोड़ दी. तो क्या? ....तारा एकदम निढाल हो आयी.  बाहर घुमड़ती बारिश से बदन पूरा निचुड़ सा गया था. लोकल की दमघोंटू बदबू से अब उसका जी मिचलाने लगा. जीभ पर तल्खी आयी और उसने सोचा,  कि तन्द्रा में उसने एक सुंदर सजावटी पीस तैयार किया. दिमाग के चौखटे में कल्पना और चाहत के रंगों से एक सुंदर, चटख रंगों वाली सुखी घर की तस्वीर. लोकल में उपस्थित लगभग हर महिला अपने सुखी परिवार की व्याख्या करते हुए हंसी-ख़ुशी जिस तस्वीर को पेश कर सके ऐसी तस्वीर. लेकिन ऐसी तस्वीरों के पीछे से झांकती उनकी बेबसी छिपाए नहीं छिपती की आज सुबह बंद गोभी काटकर रखने के लिए समय ही नहीं मिला. बबलू के युनिफ़ोर्म के टाँके उधड गए हैं, मुन्नी के छिले पैर पर बैंडेज करवानी है, मुन्ने की दवाई के समय से पहले घर पहुँचना है और सुनील अगर चक्की से पिसे आटे की बोरी लाना अगर आज भी भूल जाए तो तीसरी मंजिल से सुबह उतरकर आटा ले जाना पडेगा तब जाकर कहीं फुलके बनेंगे. लेडीज कम्पार्टमेंट में बैठी उन महिलाओं के चेहरे से टपकती कातरता और शर्मिंदगी की नाप से उनका पारीवारिक जीवन अनुपाततया श्रेष्ठ, उत्तम बनता जाता है. ऐसी ही एक तस्वीर उसने भी खींची, बस.

कल्पना में भी पति की दहशत से मुक्त न हो पाती अपनी बुद्धि पर तारा को तरस आया. दफ्तर की अन्य महिलाओं की तुलना में भले ही कल्पना से निर्मित उसका पति मानवीय रहा हो, फिर भी उसकी काल्पनिक नायिका के मन में घर देर से पहुंचने की मजबूरी में दहशत भर ही आई। वजह कुछ भी हो, तारा को लगा कि स्त्री के मन में ऐसा अपराधभाव क्यों जागे?
शादी न करने का फैसला करनेवाली औरतों के प्रति तारा के मन में गहरा आदर था। उसे लगता, एक तो वे शादीशुदा जिंदगी के सभी स्वप्नों में दूर के ढोल सुहावने इस नाते झट विश्वास कर बैठती हैं, शादीशुदा जिंदगी उनके लिए हमेशा एक सुंदर ख्वाब बनी रहती है। ऐसा ख्वाब, जिसे उन्होंने अपनी मर्जी से त्याग दिया, और अगर चाहें तो जिसे कभी भी पूरा कर सकती हैं। साथ ही, अपनी मर्जी से काम और आराम फरमाने के उनके हक भी सुरक्षित रहते हैं।

तारा को लगा, यह विश्वासवाली बात काफी अहम् है। आमतौर पर बातें अपनी वास्तविकता में इतनी ऊलजलूल होती हैं कि उनसे साबका पते ही व्यक्ति बातों की सरलता पर का अपना विशअवास ही खो बैठता है। मिसाल के तौर प रकोई बहुत ही नार्मल, मानवीय बात भी अपवादस्वरूप सच मानने से उनका मन कतरा जाता है। तारा को लगा कि उसने आखिर ऐसी कौनसी बात की है जिसकी खातिर उसे यह सब सहना पड रहा है? उसके सामने जीवन की एक एक कडी खुलती चली गई।
000000
कितने सुहाने थे वे दिन। कालेज की शिक्षा से खत्म होते होते नौकरी पायी। सहेलियों के साथ बिताए वे दिन। सबकुछ इतनी जल्दी बीत गया कि आज उन यादों की एक धुंधली तस्वीर भर उसके पास बची है।
उन्हीं दिनों राबर्ट से उसकी मुलाकात हुई थी। निश्छल व्यक्ति दुनिया की सरलता पर कितनी सहजता से विश्वास कर बैठता है। छोटी-सी मुलाकात को राबर्ट की खास कोशिशों ने ही दोस्ती तक पहुंचाया था। एक दिन अचानक राबर्ट ने ताार के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। तारा की खुशी का कोई ठिकाना न रहा जब आश्रम के अधिकारियों ने तारा को राबर्ट के साथ विवाह करने की अनुमति दे दी। बडी उमंग से उसने खरीदारी के लिए राबर्ट के घरवालों के साथ जाने की बात कही तो राबर्ट ने बताया कि उसके घरवालों को यह शादी मंजूर नहीं और वे शादी की किसी रस्म में शरीक नहीं होंगे। तारा को अपने यतीम होने का और दुनियावालों के अपने प्रति व्यवहार का पूरा अहसास था। उसने सोचा कि शादी के बाद सब ठीक ही होगा। लेकिन, अफसोस कि वह गलत साबित हुई।   
राबर्ट के घरवाले इस शादी के खिलाफ थे। और राबर्ट-तारा की छह साल की शादीशुदा जिंदगी के दौरान, उनकी पुत्री के पैदा होने, पलने-बढने के दौरान भी रॉबर्ट के मतानुसार  वे नाराज ही रहे। अनाथाश्रम में पली तारा का भरे-पूरे घर में बसने का, एकत्रित परिवार का सपना चटख गया। पर छह सालों बाद एक दिन जब रॉबर्ट भी घर से गायब हो गया तो उसके अपने परिवार के सीमित सपनों में भी शोले दहक गए। दो सालों तक रॉबर्ट तक पहुंचने की तारा की हर कोशिश नाकामयाब रही। दो साल बाद एक दिन अचानक डाक से रॉबर्ट की लिखावटवाला खत देख कर उसने सुख की कामना से धडकते दिल से लिफाफा खोला तो उसके हाथ आयी – तलाक की पेटीशन. रॉबर्ट ने दो सालों के विभक्त जीवन के आधार पर तलाक की मांग की थी। अब तारा करे भी तो क्या
तलाक ने तारा को बुरी तरह परास्त किया पर तारा को इस बात का अहसास होते होते साल भर बीत गया। रामनवाला किस्सा न होता अपनी विरक्ति में तारा को शायद अंत तक पता नहीं चलता कि वह किस कदर टूट गई है। रामन तारा के ही दफ्तर में काम करता था। रॉबर्ट और तारा के मामले में उसने सिरे से तारा की मदद की थी। हमेशा वह तारा के साथ रहा था। विधुर था, उसका अपना कोई घर-परिवार नहीं था। तारा-रॉबर्ट के घर में ही उसे अपने परिवार सा अपनत्व महसूस होता। उसने तारा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। तारा को तब अपनी थकान का अहसास हुआ। काफी सोचने-विचारने के बाद उसे लगा कि अब कोई स्वप्न देखने की अपनी मासूमियत वह खो बैठी है। हामी भर कर कहीं वह रामन के साथ अन्याय न कर बैठती
रामन ने फिर उनके दफ्तर के पडोसवाली बिल्डिंग में काम करनेवाली एक व्यस्क लॆकी से शादी कर ली। उन दोनों ने तारा और उसकी बेटी को अपने घर खाने पर आमंत्रित किया ।उनके संबंधों में तब उसे अपने सपनों की धुधली झलक महसूस हुई थी। उस दंपति के वर्तमान सुख के पीछे से झांकता अनजान भविषअय उसे काफी डरावना लगा। खालिस सोने की चमक कायम रहती है। पर सोना होने का दावा करती चीज की चमक पीछे अगर हलकी पड जाए तो खालिस सोने की चाहत और नकली सोने की संगत में मेल बिठाते बिठाते जिंदगी जर्जर हो जाती है।
तारा का जीवन खाली था, लेकिन उस दिन के बाद से उसे उस खालीपन का अहसास कचोटने लगा। अब घर के कामों से उसे काफी थकान महसूस होती। उसके मुरझाए चेहरे की ओर देख कर अचानक सयानी हुई उसकी बेटी को देख कर उसका जी भर आता। बेटी के लिए बांझ प्रेम और रहम से उसका जी रिसने लगता। दफ्तर के कामों में उससे इन दिनों कई गलतियां हुईं। घर-दफ्तर-घर का सफर वह बिल्कुल निस्पंद, निर्विकार तय करती मानो किसी जगह के उसके लिए कोई मायने ही नहीं रहे थे।
एक दिन लोकल में महिलाओं की खिलखिलाहट के बीच से उभरती एक पैनी आवाज तारा के जहन में सुई सी चुभ गई। उस आवाज को पहचानने में उसे देर नहीं लगी। कई दिनों बाद आज वह बुढिया उस डिब्बे में दिखाई दे रही थी। गानेवाली बुढिया। बाकी सब औतें उससे इतने दिनों तक गायब रहने का कारण पूछ रही थीं। बुढिया बोलने के लिए राजी नहीं लग रही थी। सभी सवालों के जवाब में उसने जब मुंह खोला तो उसमें से एक तान निकल गई –
माझ्या माहेराच्या दारी
लाडू-पेढ्यांची गं वाट
खीर बासुंदीची नदी
दूधा-दह्याचे ग पाट।।
काठी अंब्यांची गं गर्दी
साद घालिते कोकीळ
दारी पसरून उभी
माया पदराची माय।।
चला चला गं सयांनो सुख प्याया घोट घोट
उद्या आहेच सासरी
पुन्हा परतीची वाट.....
(मेरे मायके की राहों में लड्डू-पेडे बिछए रहते हैं, दूध-दही-रबडी की नदियां बहती हैं, जिनके किनारे खडे आम्रवन में कोयल की कूक गूंजती रहती है। घर की चौखट में खडी ममता का पल्लू बिछाए मां हमेशा मेरी राह देखती रहती है। सखी, सुक के घूंट पीने चलना मेरे साथ, कल फिर ससुराल की राह लौटना ही है....)
नहीं दादी, गीत की पंक्तियां तुम हर बार बदल देती हो। सोलह साल की एक लडकी ने बुढिया को बीच में टोका तो बुढिया बोल पडी,
 सुख की जाति अलग अलग ही तो होती है बिटिया। शब्दों का अंबार बीनते हुए हर बार लगता है कि अब पकड लिया लेकिन, सुख का एक बाल भी पकड में नहीं आता और जिंदगी फिसल जाती है। ...संभल के रहना बिट्टो...बहकावे में आई तो फुसलाकर सुख तुम्हें ऐसी जगह ले जाकर पटकेगा कि अपना पता पूछते पूछते खो जाओगी।
दादी, कुछ और गाओ ना. दूसरी फर्माईश पर गौर करते हुए बुढिया कुछ देर तक चुप रही। ट्रेन रुकी तो उतरनेवालों की भीड में बुढिाय को देख तारा के पैर हरकत में आए। छंटती भीड में बुढिया के साथ होते हुए उसने धीरे से आवाज दी – अम्मा...
बुढिया ने पीछए मुड कर देखा। नजर से नजर मिली तो सदियों पुराना दुख परिचय का मोहताज न रहा। साथ चलतेहुए तारा ने पूछा,
कहां रहती हो अम्मा
जरीमरी में बेटे
घर है
घर तो भागवानों के होते हैं बिटिया, अपनी तो बस ससुराल है।
कौन कौन है
मैं  हूं, मेरे गीत हैं और जब गीत नहीं होते तो खामोसी होती है....
अकेली हो
अकेली कहां दुख के ससुराल से नाता है। वह भी साथ रहता है। लेकिन अब उसके साथ की ऐसी आदत पड गई है कि मैं उसकी अलग पहचान भी भूलसी गई हूं।
क्या काम करती हो. पढी हो.
खाना पकाती हूं मेमसाब के यहां। वहीं खा-पी लेती हूं। पहले रह भी वहीं लेती थी, लेकिन मेरे गीत मेमसाब को पराए लगे। मैं भला गीतों से नाता कैसे तोड सकती हूं।
मां-बाप, भाई-बहन, पति-बच्चे कोई नहीं
हैं क्यों नहीं.. बुढिया एकदम तुनक गई। तुमने मुझे क्या अनाथ समझ रखा है. सब हैं। ...मां गुजर गई कुछ दिनों पहले। बाप को भाई-भाभी पालते हैं, मेरा बो झवे क्योंकर उठाएंगे. बहनों की शादी हो गई है, वे अपने अपने घरों में हैं। पति ने दूसरी औरत रख लीहै और बच्चे आवारगी करते हैं.
पूरी बातचीत में सलीकेके दो वाक्य अभी बुढिया बोली थी पर उनमें ऐसी कटुता थी कि निगलते हुए तारा का दम घुट गया। तारा चुप रही।
अरे जल्दी चलो, मेरी बेटी आई है..
ताराउलझन में पड गई। बुढिया ने अपनी बेटी का जिक्र तो नहीं किया था। झोपडे में कदम रखने के बाद सामान के बक्से पर बैठी तारा को देख कर एक बार फिर तारा को आशअचर्य हुआ।
थक गई है गंगा. मैं अभी चाय बनाती हूं।
मैं तेरी चाय पीने नहीं आई। एक-दो गीत सुना दे। मैं चलूं फिर. आज देर कर दी तूने लौटने में. और ये कौन है तेरे साथ।
ये भी मेरी बिटिया है गंगा, बिल्कुल तेरी तरह. अरे, बैठ ना, तू खडी क्यों है।
अम्मा, वो नीचे कैसे बैठेगी। साडी खराब नहीं होगी उसकी। आ बहन, यहां बैठ जा तू, मैं नीचे बैठ लूं।
तारा खिजला गई। गंगा ने उसके संकोच को एकदम नंगा कर दिया था। पर गंगा पर नजर पडते ही वह अपनी खिजलाहट भूल गई। गंगा पैरों से लूली थी। अम्मा ने बताया कि वह भी कहीं खाना पकाने-परोसने का काम करती है। वहीं रहती है। असल में गंगा भागवान है, उसकी मालकिन ने गंगा के दुख की जात से अपने दुख की जात छिपाई नहीं। परोसने में देरी पर बच्चे जब गंगा पर चीखने लगते हैं तो वह खुद उठ कर खाना परोसती है। इतना ही नहीं, पढने के लिए गंगा के लिए वह नई नई किताबें भी लाकर देती हैं। गंगा का भाई मिलिट्री में सूबेदार है और इसी शहर में अपने बीबी-बच्चों के साथ रहता है। पर....
तारा को अंदर सेमानो किसीने झकझोर दिया हो। उसे अपनी बच्ची की याद आई और लगा कि घर पहुंचने में उसे देर हो रही है। बुढिया और गंगा की इजाजत लेकर वह घर की ओर चल पडी। लोकल में चढते वक्त उसका पैर एक औरत के पैर पर पडा। तारा ने सॉरी कहा तो वह औरत मुस्करा दी। तारा के होंठ भी अनजाने ही मुस्कुराहट में फैल गए। बहुत भीड थी, पर तारा जहां खडी थी वहां बैठी औरत ने तारा की थकान महसूस कर तोडी देर उसे अपनी सीट दे दी। इतनी भीड में भी बच्चे को गोद में लटकाए सौदा बेचती औरत से तारा ने अपनी बच्ची के लिए मोतियों की माला खरीदी। रेजगारी लौटाते वक्त वह औरत तारा की ओर देख कर मुस्कुराई तो ताार को लगा कि उसमें और उस औरत में एक अनजान रिशअता है।
गाडी में आज उसकी नजर ने सभी चेहरों को, सभी चाजों को टटोला। सोई बच्ची का सिर गोद में रखे सब्जी खरीदती गृहिणी, उसके सामने खडी बच्ची को निर्निमेश नजरों से देखती अविवाहिता, आंखों में आतुरता लिए किताबें संभालती हुई सपनों में खोई, बार बार खिडकी से झांकती षोडशी, नशे में दूसरों पर गिर गिर जाती मजदूरन, शराब की बदबू पर नाक सिकोडती लेकिन मजदूरन को हौले से सहारा देती उसके आसपास खडी औरतें, ट्रेन की दीवारों पर लगे पोस्टर – गर्भपात केवल 100 रुपयों में, अत्याचार के खिलाफ संगठित आवाज उठाओ, युवतियों की राज्यव्यापी परिषद, बच्चे को सही समय टीका लगाओ, जीवन बीमा निगम.....उसे लगा कि आज वह कई दिनों बाद घर लौट रही है। पुल से गुजरती ट्रेन की गुर्राहट से उसके पेट में कुछ ऊपर-नीचे हुआ, खिडकी से एक बार गंदी बू आई तो अपने आप उसकी नाक सिकुड गई, यहां तक कि ट्रेन से उतरते हुए उसने एक महिला को सुना भी दिया कि उतरनेवालों की भीड से परे होकर खडी रहो वरना उतरनेवालों की भीड तुम्हें ठेल कर नीचे ले जाएगी। ट्रेन से उतरते ही तारा के पैरों में गति आई और सधए कदमों से वह आगे चली।
-----

Friday, June 25, 2010

2. औरतजात

मूल मराठी कहानी -उर्मिला पवार 
हिंदी अनुवाद -संध्या पेडणेकर
(पूर्व प्रकाशित)
वकील साहब को कोर्ट में आता देख मैं और सदाशिव उठ कर उनके पास चले गए. सदाशिव से उन्होंने कहा, ` आप कब आये?' 
`अभी अभी आ रहा हूँ,'  सदाशिव ने कहा.
`सबूत लाये हो?'  उन्होंने पूछा.
ना में गर्दन हिलाते हुए सदाशिव ने कहा, `मैंने कोशिश की, लेकिन कोई कुछ कहने के लिए तैयार नहीं है. जिस पुरोहित ने शादी करवाई वह भी बात को टाल गया....' पता नहीं सदाशिव सच बोल रहा था या झूठ, लेकिन वकील साहब ने भौहें तानते हुए कहा, `ठीक है, जो सबूत उपलब्ध हैं वाही पेश करेंगे. वह, टूटा हुआ ताला तो है ना?'
पर्स में रखा हुआ ताला टटोलते हुए मैंने हामी भरी. वकील साहब ने पूछा, `और वह पड़ोसन आयी है? '
`साब, वह डरती है. उसके पति ने उसे धमकाया है. ताला तोड़कर प्रभाकर घर में घुसा और उस वक्त उसके साथ कोई दूसरी औरत थी यह बात किसीसे ना कहने की उसे सख्त हिदायत दी गयी है,'  मैंने कहा. 
`तो सब भगवान् भरोसे है, क्यों? ठीक है, हम उसे सम्मन भेजेंगे. अगली तारीख लेंगे. आज सदाशिव की गवाही लेंगे. तब तक मैरिज सर्टिफिकेट......' मैंने गर्दन हिला कर हाँ कहा और हारे हुए खिलाड़ी की तरह निराश होकर मैं बेंच पर बैठ गयी. मेरे पास आते हुए लगभग धमकाने वाले अंदाज में सदाशिव ने कहा, `बाबा ने कहा है, अभी भी सोच लो. केस वापिस ले लो. अपने यहाँ आज तक किसी औरतजात ने अपने पति पर केस नहीं ठोंका है, खासकर तलाक का!'
मुझे गुस्सा आया. मैंने लगभग चिल्लाते हुए कहा, `क्यों मेरा दिमाग चाट रहे हो? शादी का सबूत लाने के लिए रुपया देकर तुम्हें गाँव भेजा था. क्या किया तुमने? कुछ नहीं. खाली हाथ वापस लौट आये. और यहाँ बैठ कर मुझे धमका रहे हो. निकल जाओ यहाँ से.'  वह सचमुच उठ कर चलता बना. मैं देखती रह गयी. वह सामने वाले होटल में जाकर बैठ गया. अब मेरे ही पैसे से वह ठूंस कर खायेगा.
सदाशिव मेरा भाई है, सौतेला भाई होने के बावजूद मैंने उसे कभी सौतेला नहीं माना। एक ही घर में पैदा हुए, बढे। मेरी गोद में वह पला-बढा। कहते हैं, साथ साथ रहने से प्रेम बढता है, लेकिन प्रेम सिर्फ मेरे ही मन में बढा। सदाशिव के मन में बढा ही नहीं। ऐसा क्यों? असल में मुझे उस पर गुस्सा होना चाहिए था। मेरे बाबा के प्यार में वह और उसकी मां हिस्सेदार बन कर जो आए थे।
सम्मन लेकर प्रभाकर को घेरने में सदाशिव की मदद जरूर मिली थी। प्रभाकर ने पहले कई बार सम्मन की तारीख पता कर झांसा दिया था। लेकिन सदाशिव उसे कहीं भी घेर लेगा यह जब उसने जाना तब वह चुपचाप नोटिसें लेने लगा।
दोपहर की चिलचिलाती धूप में सूनी आंखों से सामने देखते हुए बैठी थी कि अचानक पान के ठेले पर खडा सदाशिव दिखाई दिया। किसी से बतियाते हुए वह पान चबा रहा था और सिगरेट के छल्ले हवा में उछाल रहा था। वह जिससे बात कर रहा था वह ...प्रभाकर था शायद! मेरी तरफ उसकी पीठ थी। प्रभाकर के साथ उसकी बीबी थी, मेरी सौत. कोर्ट में भी वह खुल्लमखुल्ला प्रभाकर के साथ घूम रही थी, मानो मुझे और कोर्ट को चुनौती दे रही थी – साबित कर लो कि हमारी शादी हुई है, ठेंगे से! सदाशिव न जाने किस बात पर उनके साथ खडा बतिया रहा था और अपनी बत्तीसी दिखाते हुए हें हें कर हंस रहा था। पल भर के लिए मेरा दिमाग भिन्ना गया।
सदाशिव सबूत लाने के लिए गांव गया था। लेकिन वहां जाकर उसने गांव के लोगों की बैठक ली। बैठक में निर्णय लिया गया कि बच्चा पैदा होने तक मैं उन दोनों को अपने घर में ठौर दूं। बच्चा पैदा होते ही वे दूसरी जगह रहने चले जाएंगे।
मैं कैसे यह बात मानती? दो पत्नियों के बीच एक पति वाली तिकोनी गृहस्थी मुझे नहीं चाहिए थी। उन दोनों का साथ साथ उठना-बैठना मैं कैसे देख पाती? इसलिए मैंने निर्णय किया था कि जब प्रभाकर ने उसके साथ शादी की है तो वे दोनों अलग घरबार लेकर रहें। मेरे घर में अब वे नहीं रहेंगे। मेरी अम्मा ने जो सहा था वही सब सहने की ताकत मुझमें नहीं थी।
मेरे पैदा होने के बाद अम्मा के कोई और बच्चा नहीं हुआ। इसलिए मैं दस साल की थी तब बाबा ने दूसरी शादी की। इसतरह माई घर आई। अम्मा ने बडे दिल से माई को स्वीकारा। अपने परिवार में उसके लिए जगह बनाई। लोग अम्मा की तारीफ करते। कहते – ''औरत हो तो तारा की मां जैसी हो। सौत के साथ अपनी छोटी बहन जैसा व्यवहार है  उसका।" सुन कर अम्मा हंस देती लेकिन लगता जैसे रो रही हो। अम्मा की हालत देख मुझे माई पर गुस्सा आता। बाबा पर भी गुस्सा आता। दो शादियां करनेवाले सभी पुरुषों और उनकी दो नंबर की बीवियों से मुझे नफरत थी।
मुझे लगता औरतें ही औरतों के घर तोडती हैं। ऐसे कई पुरुष हमारे रिश्तेदारों में थे जिन्होंने मामूली सी वजहों से दुबारा शादी रचाई थी। बच्चा नहीं है, बच्चे हैं लेकिन बेटा नहीं है, घर में काम करने के लिए औरत नहीं है, किसी औरत का कोई सहारा नहीं है, किसी के बगैर चैन नहीं आता, कोई मन को भा गई इन जैसी वजहों से पुरुष दूसरी या तीसरी शादी करने में हिचकते नहीं थे। लेकिन कभी मेरा पति भी यह करेगा मैंने नहीं सोचा था। प्रभाकर पढा-लिखा है, नौकरी करता है और कार्यकर्ता है। लेकिन शादी के चार-पांच साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ तो उसका स्वर भी शिकायती हो आया। मेरे ससुरालवालों ने और मायकेवालों ने भी उसे दूसरी शादी की सलाह देनी शुरू कर दी। 
रात-दिन सभाओं, मोर्चों, शिविरों, लोगों के सरकारी काम करवाते, कार्यकर्ताओं से मिलने आदि में प्रभाकर का दिन बीतता। फुर्सत से बातचीत करने या कुछ तय करने के लिए उसके पास समय ही नहीं रहता था। घर लौटते ही बाहर के सारे कामों की थकान वह बच्चा न होने का बहाना बना कर मुझ पर उतारता। धीरे धीरे यह रोजमर्रा की बात हुई। मैं भी तंग आ गई। प्रभाकर के पीछे पड कर मैंने अपना और उसका चेकअप करवा लिया। दोनों की रिपोर्ट बिल्कुल नॉर्मल थी। पता नहीं बात कहां अटक गई थी। प्रभाकर से मैंने कहा कि हम दूसरे डॉक्टर को दिखाएंगे। साथ में, मैंने उसे दौरे कम कर घर पर ध्यान देने के लिए भी कहा। लेकिन उसने कभी मेरी बात नहीं मानी। उल्टे, बच्चा नहीं है इसे मेरा कसूर मान कर चिढता, झगडता, दूसरी शादी की बात करता। मेरे पिता की, और कइयों की दो-दो शादियों का जिक्र करता। 
एक दिन बिना कुछ कहे प्रभाकर गायब हो गया। पंद्रह दिनों बाद वह लौटा। सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से उसका घूमना-फिरना बदस्तूर जारी था। इसलिए मुझे कोई शक नहीं हुआ। इसी दौरान उसके एक दोस्त ने आकर खबर दी कि वह गांव गया है। 
प्रभाकर लौटा तो मैंने उसे गुस्से से पूछा, "इतने दिन कहां थे? हमेशा, हर-वक्त घर से बाहर क्यों रहते हो?" वगैरा। जवाब में फुफकारते हुए उसने कहा, 
`घर में है ही क्या देखने के लिए?'
`यानी, बाहर कोई देखनेलायक मिल गई है क्या?'
`कुछ ऐसा ही समझो!'
`मतलब?'
`देखो तारा, मैं बच्चा चाहता हूं।'
`मैं नहीं चाहती?'
`इसीलिए कह रहा हूं, देखो, पहले भी इस विषय पर अपनी बातचीत हो चुकी है। बेकार में वही बातें दोहराने का.....'
`कौन है वह?' उसे बीच में ही टोकते हुए मैंने पूछा। 
`तुम्हारे ननिहाल की तरफ की ही है। सोनबावडी की।' 
यानी सदाशिव के ननिहाल की। माई की गांववाली। मेरे माथे की नस तडकी। मैंने पूछा, ' आखिर क्या करना चाहते हैं आप?' 

'वही मैं बता रहा था...हमने गांव में शादी कर ली है। उसे यहां लाने के लिए तुम्हारी इजाजत.....' 
'मेरी इजाजत?' मैं चीकी। मेरे पूरे बदन में आग लग गई। 'शादी करने से पहले मेरी इजाजत ली ?  फिर अब ये तमाशा क्यों कर रहे हो?' 
'तमाशा कैसा? मैंने शादी की है उसके साथ!'

'वाह! क्या तीर मारा है! लेकिन यह सब ऐसे चोरी-छिपे क्यों किया? करने के बाद फिर यहां क्यों आए हो? जहां किया वहीं रहते। क्या तुम जानते नहीं कि ये घर मेरा है?' मैंने जो कहा वह सुन कर प्रभाकर कुढ गया। बोला, 'हां, हां, जरा मुंह संभाल कर बात करना।' मैंने कहा, 'क्यों? तुमने मुझे धोखा दिया, मेरी सौत लेकर आए इसलिए चुप रहूं? खुद गुनाह करके मुझ पर रौब गांठने में शर्म नहीं आती?'
प्रभाकर दौड कर मेरे पास आया। झटके से उसने मेरी कलाई पकडी और मरोडते हुए बोला, 'खबरदार अगर मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश की तुमने!'
चिल्लाकर मैंने पूछा, 'क्या कर लोगे?' प्रभाकर का हाथ उठा और एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद हुआ। वह बोला, 'बांझ होकर मुझसे जबान लडाती हो?'
मैंने होश गंवाए हों जैसे। मैं चिल्लाई, 'चले जाओ.....निकल जाओ यहां से....' मैं शायद बहुत जोर से चिल्लाई थी। क्योंकि किसीने हमारे घर की कुंडी बजाई। दरवाजा खोल कर देखा तो डरी हुई पडोसन पूछने लगी कि, क्या हुआ? उसे परे हटा कर मैं दरवाजे से ही चिल्लाई, 'निकलो, निकल जाओ कहा ना?'
खुला दरवाजा, उसमें से झांकते पडोसी और मेरा चंडिका का रूप देख कर प्रभाकर बौखला गया। बात ऐसा मोड लेगी उसने शायद सोचा नहीं था। 
दांत पीसते हुए उसने अपना ब्रीफकेस उठाया और मेरी तरफ देखते हुए आंखें तरेर कर कहा, 'देख लूंगा तुझे...' और वह झट-से बाहर निकल गया। मैं सोफे पर लुढक गई। सब पडोसनें पूछ रही थीं, 'क्या हुआ?, क्या हुआ?' लेकिन मैंने उनसे कहा, 'कुछ नहीं, आप लोग जाइए। मेरी आवाज इतनी अजीब थी कि खुद मुझे पराई लगी। 
पता नहीं कितनी देर तक मैं उसी तरह बैठी रही। अंधेरा घिर आया तो मुझे एक बात का डर लगने लगा। रात में लौट कर प्रभाकर ने दरवाजे पर तमाशा खडा किया तो मैं क्या कर सकती थी? मैं फिर उठी। थैली में दो साडियां ठूंसी। दरवाजे पर बडा सा ताला लगाया और सदाशिव की खोली की तरफ चल दी। 
सुनते ही सदाशिव भडक गया। 'उसकी ये मजाल!' कहते कहते दो-चार तगडी गालियां उसने प्रभाकर के नाम पर थूक दीं। फिर मुझसे पूछा, 'फिर अब करना क्या चाहती हो तुम?'

'उस पर मुकदमा ठोंकेंगे और क्या?' मैंने कहा। 
'और नहीं तो क्या?', सदा ने भी कडा रुख अपनाते हुए कहा, उसे अपने किए की सजा तो दिला कर रहेंगे। बाद में वह और उसकी बीबी मिल कर देर तक प्रभाकर को गालियां देते रहे। 
मैं रात भर सो नहीं पाई। प्रभाकर का हमेशा घर से गायब रहना, दूसरी शादी के बारे में बताना और झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर जडना सब एक एक कर याद आने लगा। बेइज्जती के बिच्छू का जहर पूरे शरीर भर में फैला। सुबह मैंने सदाशिव से कहा कि वह प्रभाकर की कंपनी में जाकर उससे मिले और पता करे कि लडकी कौन है? और कब उन दोनों ने शादी की? 
सदाशिव ने कहा, 'ठीक है। पता करते हैं कि उसने किया क्या है? और तुम, दफ्तर नहीं जाओगी आज?'
'नहीं, हरारत सी लग रही है। तुम वहां रुकना मत, शाम को जल्दी चले आना।' 
'जरा दस रुपये देना तो...', खिसियानी हंसी हंसते हुए सदाशिव ने कहा।  उसे दस के दो नोट थमाते हुए मैंने कहा,'कुछ पता करके ही आना। सुराग जरूर लाना।'

दोपहर ढलने के बाद सदाशिव लौटा। लेकिन लौटा हुआ सदाशिव कोई और ही था। "हो सकता है प्रभाकर की गलती हुई हो, लेकिन बच्चा पाने के लिए....." कहते हुए वह मुझे ही समझाने लगा। 
उसकी बातें अब मेरे लिए बेमतलब हो गई थीं। उसकी बातों से कुल इतना पता चला कि चार दिन पहले गांव में ही प्रभाकर की शादी हो चुकी है। और उसकी नई ब्याहता गांव में प्रभाकर के ही घर में रहती है। 
रातवाली थैली उठा कर मैं शाम की गाडी से गांव रवाना हुई। सदाशिव को साथ चलने के लिए कहा लेकिन उसने मना कर दिया। रात यात्रा में बीती। सुबह थके हुए तन मन से मैंने गांव में कदम रखा तो सबको अपनी तरफ ही ताकते हुए पाया। किसी के चेहरे पर मुझे पढने की कोशिश थी, तो कोई चेहरा प्रभाकर की पत्नी किसलिए आई होगी इस बात का अंदाजा लगा रहा था। 
आंगन में आई तो देखा कि ससुरजी बरामदे में बैठे चिलम पी रहे हैं। मुझे देखते ही वह सकपकाए। उन्होंने कहा, "आं, ताराबाई, अचानक कैसे आना हुआ?" मैंने थैली नीचे रखी। अभी बैठ ही रही थी कि अंदर के दरवाजे के पास कहीं चूडियां खनकीं। मैंने महसूस किया कि पल भर में झांक कर कोई दरवाजे के पीछे छिप गया। 
मैं कुछ कहती इससे पहले ससुरजी बोले, "ताराबाई, यात्रा से थक गई होगी। हाथ-मुंह धो लो, चाय पिएंगे, फिर बातचीत होती रहेगी।" "अब बचा क्या है बोलने के लिए?", मैंने कहा, इतना सब कुछ हुआ और आपने मुझे खबर तक नहीं की..."
"क्या कहा? बताया नहीं?" जली हुई तमाखू चिलम से नीचे झटकते हुए अचरज भरे स्वर में ससुर ने कहा। लेकिन प्रभाकर ने तो यही कहा कि इस शादी को लेकर तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है। 
मैं समझ नहीं पाई कि ससुरजी को क्या कहूं। गुस्से से सिर चकराने लगा। सीढियां उतर कर मैं एकदम अंदर गई.... अंदर चूल्हे के पास मेरी सौत घूंघट काढे बैठी थी। मुझे देख कर वह डर गई। बिल्ली की तरह मुझे देखने लगी। उसके हाथ की हरी चूडियों या उसकी माथे की बडी बिंदी से ज्यादा उसकी कमसिनी मेरे सीने में खंजर की तरह उतर गई। अचानक मैं चिल्लाई, "इसका अंजाम बहुत बुरा होगा, कहे देती हूं।" ससुरजी हडबडाकर अंदर आते हुए बोले, "धीरज से काम लो तारा बहू, धीरज से।" 
"कैसे धीरज धरूं? यह सब करके मेरी जिंदगी में आग लगाते हुए आप लोगों के मन में मेरा खयाल तक नहीं आया......।" मैं चीख चीख कर बोल रही थी। आवाज सुन कर गांव के लोग आंगन में इकठ्ठे हो गए। ससुरजी बाहर गए और उन पर बरसे, "यहां क्या तमाशा चल रहा है? चलो, निकलो यहां से।" लोग जाने के लिए मुडे तो मैं चिल्लाई, "रुको, मैं आपसे पूछती हूं, मैं इस घर की बहू हूं और मेरे होते हुए आप इस लडकी को कैसे बहू बना कर ले आए? क्यों ले आए?"
मेरी बात जैसे लोगों तक पहुंची ही नहीं। वे चुपचाप चलते रहे। चलते चले गए। अपनी थैली उठाते हुए उनके पीछे मैं भी चल पडी। ठीक है, मैं भी देख लूंगी....

"ताराबाई...ताराबाई...सुनो..." ससुर कहते रहे, लेकिन मैं रुकी नहीं। 
धूप अब तेज हो गई थी। बदन जलने लगा था। मन भी गुस्से से सुलग रहा था। जंगल रौंदते हुए मैं मायके की तरफ बढ रही थी। ठोकरों से पैर लहूलुहान हो गए थे। मायके पहुंची तो सब सुनसान था। दरवाजे भिडा कर सब लोग खलिहान गए हुए थे। घर में बस अम्मा थी। इन दिनों बाबा और वह बीमार चल रहे थे। अम्मा घर पर थी यानी दोनों में से कोई बीमार था यह बात पक्की थी।
मुझे आंगन में देख कर अम्मा बांह पसारे आगे आ गई। मुझसे लिपट कर रोने लगी। मैंने पूछा तो अम्मा बोली, "बेटी, देखो, तेरे बाबा बीमार हैं। तेरी खबर सुनते ही उन्होंने खाट पकड ली। हम लोगों को पहले कुछ पता ही नहीं था। उस दिन मेले में तुम्हारे पति से बातें हुईं लेकिन उन्होंने हमें कुछ बताया नहीं। फिर खबर आयी कि उसने तुम्हारी इजाजत से दूसरी शादी रचा ली है।" 

मैंने चुपचाप उनकी सारी बातें सुनीं। बाबा बिस्तर पर ही उठ कर बैठ गए। मैंने पूछा, "क्या तकलीफ है बाबा?", तो बोले, "अब क्या होना है? अब हम थक गए, झुक गए। अब यह सब चलता रहेगा। ...."
अम्मा ने पानी का लोटा सामने रख कर कहा, "जाओ, हाथ-मुंह धो लेना, कुल्ला कर लेना...मैं तब तक नहाने का पानी चढाती हूं।" 
मैंने मुंह धोकर चाय पी। थके शरीर को दीवार का सहारा देते हुए बैठ गई। फिर कहा, "बाबा, रात को चार समझदार लोगों को बुलाना। मैं कुछ फैसले करना चाहती हूं।" मैंने जो कहा वह सुन कर दोनों ने एकदूसरे की तरफ देखा। कुछ समय बाद अम्मा ने कहा, "बाई, अपना भाग्य ही खोटा हो तो किसको दोष दें। फिर हमारी तो है औरत जात।"
"अम्मा, क्या भाग्य सिर्फ औरत का ही होता है?"
"वो बात नहीं, लेकिन हम सौतें भी बहनों की तरह रही ना?"
"अम्मा, आपने जो किया वह शिक्षा हमें मत देना। वह समय ही था वैसा। लेकिन अब जमाना बदल गया है।" 
"ठीक है, लेकिन यह तो बताओ कि तुम करना क्या चाहती हो?"
"मैं तिकोना घर नहीं चाहती। मैं तलाक चाहती हूं।" मैंने बेझिझक कह दिया, "देखो, हमारा पक्ष लूला है। तुम्हारी शादी को आज दस साल हुए। अभी बच्चा पैदा नहीं हुआ।" 
"तो क्या अब आप लोग गॅारंटी दे सकते हैं कि बच्चा पैदा होगा?" मेरे सवाल का जवाब बाबा के पास नहीं था। वह चुप रहे। इतने में दो-तीन गांववाले और चाचा आए। उन्होंने जो कहा उसका सार यही था कि प्रभाकर ने शादी ही की है। किसी औरत को लाकर बिठा तो नहीं लिया। प्रभाकर की शादी के बारे में बात चली तो किसीने कहा कि उसने बंबई में ही शादी की और पत्नी को लाकर यहां रखा। किसीने कहा कि भिंगरोली के बौद्ध विहार में उसने शादी रचाई। 
वैसे तराली और भिंगरोली अगल-बगल के गांव हैं। यहां किसीने भौं टेढी की तो वहां पता चल जाता है। इसके बावजूद कोई खुलकर साफ साफ कुछ कह नहीं रहा था। 
मैंने कहा, "देखो, प्रभाकर ने शादी कर ली और अब उसकी बीबी उसके साथ ही रहती है। इन दो बातों पर गौर करके पंचायत बुला लो। इसका विरोध करो। प्रभाकर को सजा भी दिला दो। सबसे जरूरी है पंचायत का यह फैसला करना कि अब मेरा और उसका रिश्ता खत्म हो चुका है। और प्रभाकर को ताकीद दें कि अब वह मेरे घर में रह नहीं पाएगा। मेरी बात सुनकर चाचा ने कहा, "ये क्या बोल रही हो? औरतजात हो तुम। अकेले कैसे रहोगी।?" मैंने तैश में कहा, क्यों नहीं रह सकती। कितनी ही औरतें हैं जो अकेले रहती हैं। मैं भी वैसे ही रह लूंगी। लेकिन मैं उन दोनों को सबक सिखाऊंगी। लोग एक-दूसरे का मुंह देखते, नाक-कान खुजाते सुन भी रहे थे। 
उनकी उदासीनता और चुप्पी से जो संकेत मुझे मिल रहा था उसे मैंने स्पष्ट रूप से भांप लिया। असल में वह मेरा, मेरी पढाई-लिखाई का, नौकरी और वैवाहिक जीवन का, मेरी भावनाओं का, व्यवस्थितता का और मेरे वजूद का ही अपमान था। 
दोपहर में रोटियां खाकर तुरंत लौटने की मैंने सोची थी। मगर मां बोली, "बेटी, आते ही लौट मत जाना। रात भर तो ठहरो। रात में बातें करेंगे।" 
'बात करने को बचा ही क्या है?' मैंने तुनककर कहा। अभी मत जाओ, चेहरा कितना उतर गया है तुम्हारा। मां को सिर्फ मेरा चेहरा नजर आ रहा था। वह मेरे मन की थाह नहीं ले पा रही थी । रात को मुझे इसका पूरा अहसास हो गया। 
अंधेरा होते ही माई घर में आई। सारा शरीर कीचड  सना हुआ। बाल चेहरे पर बिखरे हुए। पसीने से तर। सिंदूर नाक तक फैल आया था। उसके हाथ में फावडा और कुदाल थी। और भी कुछ सामान था। आते ही मुझे उडती निगाहों से देख कर वह सीधे पिछवाडे चली गई। उसकी नजर और उसका यूं चले जाना मुझे अखरा। उसने मुझसे "कैसी हो, या कब आई?" तक नहीं पूछा। पूछती भी किस मुंह से। मेरी सौत उसकी गांववाली थी। इतना ही नहीं, रिश्ते में वह उसकी दूर की बहन थी। फिर मैंने भी उसे सुनाते हुए अम्मा से कहा, "हंसते-खेलते घर में आग लगाने की आदत ही है सोनबावडी की औरतों को पता नहीं और कितने घरों में आग लगाएंगी।" 
अम्मा ने एकदम से कहा, 'बेटी, इस शादी के बारे में उसे कुछ भी पता नहीं है। उसे कुछ मत कहो। मैंने कहा, क्यों न कहूं। अम्मा तुम चुप रही इसलिए तुम्हें यह वनवास झेलना पडा। अब यही सब मेरे हिस्से भी आ गया....." गुस्से में मैं बोलती चली गई। अम्मा उठ कर अंधेरे में बाहर कहीं चली गई। 
रात खाना खाते समय लालटेन की रोशनी में मै माई की तरफ देख रही थी। लेकिन न उसने मेरी तरफ देखा और न बात ही करने की कोशिश की। उसकी चुप्पी मुझे अम्मा-बाबा और गांववालों के शब्दों से ज्यादा गड रही थी।
अम्मा और मैं आंगन में लालटेन के इर्द-गिर्द चुपचाप बैठी थीं, अपने अपने जखमों की टीस सहती हुईं। इतने में पांच औरतें आईं। हमारे आसपास बैठ गईं। अम्मा ने कहा, "तारा पहचानती हो इन्हें?"
मैंने देखा, उनमें से दो-तीन के चेहरे पहचाने से लगे। पढाई और नौकरी की वजह से मैं सदा बाहर ही रहती आई थी सो गांव की सभी औरतों को मैं ठीक से जानती नहीं थी। उनके सिर पर ओढे पल्लू, माथे के सिंदूर, की जगह का गोदना और सभी चेहरों पर छिपाने की लाख कोशिशों के बावजूद फैली असहायता। 
अम्मा बोलती रही, "बेटा, ये सब हमारे जैसी ही हैं। इनको देखो। वह है धुर्पदा। चार लडकियां पैदा हुईं तो खुद पति का ब्याह रचा कर सौत घर ले आई। यह है चांगुना। इसका घरवाला मिलीट्री में गया और वहां से दो औरतें साथ लेकर आया। और इस सजनी को देखो।" अम्मा ने एक बहुत ही दुबली और बिखरे बालों वाली औरत की तरफ उंगली उठाई। अम्मा हंसने लगी। बाकी औरतें भी हंस रही थीं। सजनी भी हंस रही थी। 
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वे सब किस बात पर हंस रही थीं। फिर अम्मा ने बताया, "अरे, यह तो पगली है। शादी हुई तब यह छोटी थी। लेकिन बडी होने के बाद भी इसने पति को पास फटकने नहीं दिया। वह पास आता तो यह चिल्लाती। भाग जाती जंगल में। सास से कहती कि पति के साथ घर में अकेले नहीं रहूंगी। आप भी मेरे साथ रहना।" फिर इसके पति ने दूसरी शादी की। अम्मा बता रही थीं और सब हंस रही थीं। मैंने सजनी की तरफ देखा, दर्द से उसका चेहरा निचुड गया था। अचानक उठकर वह चली गई। 
अम्मा ने कहा, "बेटी, इन सबने सौत को अपनाया, तू भी अपना।" अम्मा का बर्ताव मुझे बडा अटपटा लगा। गुस्सा आया। मैंने कहा, "अम्मा, यह सब तुम क्या कह रही हो? ये सब शरीर के घाव थोड़े ही हैं कि गिन कर, नाप कर देखें कि किसके घाव कितने गहरे हैं? कितने बड़े हैं? इस मामले में सांत्वना भी कैसे दी जा सकती है? मैं अब किसीसे भी कुछ भी सुनना नहीं चाहती," - कहते हुए मैं उठ कर अंदर चली आई तो देखा कि अंदर दरवाजे के पीछे खड़ी माई हमारी बातें सुन रही थी।
उसके बाद मैंने पक्का कर लिया कि अब चाहे जो हो, प्रभाकर पर मुकदमा ठोंकना ही है। रुपया खरचना पड़ेगा, छुट्टियां लेनी पड़ेंगी और सबके खिलाफ खड़े होना पड़ेगा। चलेगा। इससे कम से कम मेरे मायके वालों को और ससुराल वालों को सीख तो मिलेगी। 
"प्लीज योर ऑनर", शब्दों से मेरी तंद्रा टूटी। वकील कोर्ट के सामने केस रख रहे थे... ''फरियादी ताराबाई सोनावणे को प्रभाकर सोनावणे ने बहुत सताया है। ताराबाई के घर में प्रभाकर जबरन एक औरत के साथ घुस कर रहने लगा था। ताराबाई ने इसका विरोध किया तो उन्हें गंदी गालियां पडीं और उन्हें पीटा भी गया। ये गंभीर अपराध हैं।'' - वकील कोर्ट के सामने केस खड़ा कर रहे थे। 
उन्होंने कहा, "ताराबाई ने फलां तारीख को प्रभाकर और उसके साथ रहनेवाली महिला को घर से भगा दिया। इसीलिए चिढ कर आरोपी प्रभाकर ने ताराबाई के ऑफिस जाने के बाद उसके घर का ताला तोड़ा और उस महिला के साथ घर में प्रवेश किया। उस समय ताराबाई के पड़ोसी भी उपस्थित थे।" 
अपने जवाब में प्रभाकर ने साफ इनकार किया कि उसने ताराबाई के घर का ताला तोड़ा। ताला तोड़े समय साथ किसी महिला के होने की बात से भी साफ इनकार किया। उसने कहा, ''मैंने दूसरी शादी नहीं की। सो किसी औरत का मेरे साथ होने का सवाल ही नहीं उठता। फलां फलां तारीख को मैं गांव लौटा और रास्ते में एक परिचित व्यक्ति से मेरी भेंट हुई। उसी के साथ मैं घर लौटा। अपनी चाभी से दरवाजा खोल कर अंदर गया। बाद में ताराबाई ने वह चाभी मुझसे ले ली।'' 
'तुम्हारे साथ दूसरा व्यक्ति कौन था?' वकील ने पूछा। जवाब देते हुए प्रभाकर के चेहरे पर धूर्त हंसी  थी, मेरी तरफ देखते हुए उसने कहा, "मेरी इकलौती पत्नी का इकलौता भाई - सदाशिव कांबले मेरे साथ था।" मैंने चौंक कर सदाशिव की तरफ देखा तो वह मुझे 'शांत रहो', 'रुको' के इशारे कर रहा था। 
वकीलों ने फिर सदाशिव पर प्रश्नों की बौछार की पर किसीने सदाशिव पर जैसे मंत्र ही फेर दिया था। उसने अपनी जबान से प्रभाकर की शादी नहीं होने का सफेद झूठ परोसा। और कहा, ''इधर कुछ समय से मेरी बहन ताराबाई और बहनोई प्रभाकर के बीच झगडे चल रहे थे। बच्चा नहीं होना ही उन झगड़ों की जड़ थी यह सब लोग जानते हैं।'' 
फलां तारीख को मेरे बहनोई मुझे रास्ते में मिले। उन्होंने घर चलने के लिए कहा सो मैं उनके साथ घर चला गया। प्रभाकर ने चाभी से दरवाजा खोला। हम लोग अंदर दाखिल हुए। ताराबाई की गलतफहमी को कोर्ट दूर करे और दोनों को आपस में मिल जुल कर रहने की सलाह दे!" 
काफी लंबे बयान के बाद सदाशिव को शादी का सबूत पेश करने के लिए कहा गया। अगली तारीख तय करने के बाद कोर्ट बर्खास्त हुआ। वकील भुनभुनाते हुए ही बाहर निकले। उन्होंने कहा, ''तुम्हारा इकलौता गवाह, तुम्हारा भाई भी तुम्हारे खिलाफ क्यों गया?''
''साहब, मैं क्या कर सकती हूं? गांव से लौटने के बाद केस को लौटाने के लिए, फिर पति के साथ मैं रहूं इसके लिए वह मेरे पीछे पड़ा था।'' मैं कह रही थी- ''तो क्या बिना किसी पूर्वसूचना के उसे ऐसा करना चाहिए? चाहे तो झूठी गवाही देने के जुर्म में हम उसे सजा भी दिला सकते हैं।''           
''हां साहब, लेकिन बिना सबूत के मैं कुछ भी नहीं कर सकती हूं यह भी वह जानता है। इसके बावजूद मैं यह केस लडूंगी साहब...''
''किसके सहारे?''
''देखते हैं, कोई न कोई राह निकल ही आएगी।" मैंने कहा तो सही लेकिन खुद मुझे अपनी नाव डूबती महसूस हो रही थी।  
"ठीक है, फिर एक बार मैं आपके पड़ोसियों से मिल लेता हूं। देखते हैं मेरी बातों का क्या असर होता है... इसके बावजूद शादी का प्रमाणपत्र तो चाहिए ही।" मेरा वकील तक मेरे खिलाफ हो गया था। मैं निपट अकेली हो गई थी। 
दूसरे दिन दफ्तर गई तो सहेलियों ने कहा, "गांव जाओ, किसी पुरोहित को पकड़ो, रुपए देकर प्रमाणपत्र ले आओ। जब प्रभाकर झूठ बोल रहा है तो उसे सबक तो सिखाना ही पड़ेगा। सच पूछो, तो घर की चीजों के गुम होने की रपट भी तुम्हें लिखवानी चाहिए।'' 
सचमुच, ऐसा ही करें तो? - वैसे भी प्रभाकर मुझे सब तरफ से कंगाल बनाकर ही गया है। मेरा अपना भाई सदा भी उसके साथ हो गया है। मेरी सौत दूर के रिश्ते में उसकी मौसी जो लगती है! शायद इसीलिए वह प्रभाकर से जा मिला। इस बहाने भाई से भी बदला लिया जा सकता है। तीन-चार दिनों तक यही विचार मेरे मन में कौंधते रहे। मैं कोई निर्णय नहीं ले पाई। उस दिन वकील आनेवाले थे सो कुछ बातें उन्हें भी बताई जाएं फिर निर्णय लिया जा सकता है।
उस दिन मैं ऑफिस से जल्द ही घर पहुंची। वकील के आने की बात पड़ोसन को बताई और ताला खोल कर तुरंत घर में घुस गई। प्रभाकर का डर भी था, न जाने कब आ धमके। 
कपड़े बदल कर चाय रखी तो बेल बजी। मुझे लगा वकील होगा। कीहोल से झांक कर देखा तो दंग रह गई। बाहर माई खड़ी थी। मैं डर गई। ये क्यों आई होगी? डरते डरते, बड़ी सावधानी से दरवाजा खोला। वह अकेली ही आई थी। उससे कुछ बोलने की इच्छा ही नहीं हुई। उसने भी कुछ नहीं कहा। अंदर आकर जमीन पर ही बैठ गई। पानी का गिलास उसके सामने रखते हुए फिर मैंने ही बात छेड़ी, 
"कब आयी?"
"सुबह।,"
"यहां कौन ले आया?"
"सदा।"
"बाबा, अम्मा कैसे हैं?"
"ठीक हैं।"
वह नाप-तौल कर ही बोल रही थी। लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे अंदर से लग रहा था कि वह बहुत कुछ बोलने आई है। वह क्या बोलना चाहती थी, यह भी मैं जानती थी। सदा ने मेरे खिलाफ झूठी गवाही दी थी। उसे मैं अंदर करवा सकती थी। मेरी सौत माई की बहन लगती थी। शायद वह यही कहने आई थी कि मेरी बहन और अपने भाई को माफ कर दो। 
उसके सामने चाय रख कर मैंने पूछा, "क्यों आयी हो?"
चाय की भाप की तरफ देखते हुए माई ने कहा, "तारा, मुझे लगा कि मैं तुमसे मिलूं। तुमसे बात करूं।" एक घर तो तोड़ चुकी थी अब दूसरा घर तोड़ने चली थी वह! एक बार लगा कि बिना कुछ भी कहे-सुने उसका हाथ पकड़ कर घसीट कर उसे घर से बाहर कर दूं। लेकिन मैं कप के ऊपर से बस उसे देखती रह गई। उसने आगे कहा, "मैं जानती हूं कि तुम मुझसे नाराज हो, बिल्कुल बचपन से ही नाराज हो। क्योंकि, मैं घर में आई इसलिए तुम्हारी अम्मा पर अन्याय हुआ ऐसा तुम्हें लगता था। लेकिन कभी मेरे साथ हुए अन्याय के बारे में सोचा है? तुम जब दस साल की थी तब मैं सत्रह साल की थी। मुझे मां बुलाते समय तुम्हें दुख होता, तुम्हें बेटी कहते समय मुझे भी बुरा लगता। लेकिन ये बातें आखिर बताएं तो किसे?"
"तुम्हारी मां ने मुझे अपनाया इसलिए उन्हें बड़प्पन मिला, लेकिन मैंने सबको अपनाया तो मुझे क्या मिला? दो बीबियों का पति होना पुरुष के लिए आनंद की बात होगी लेकिन इससे औरत के जीवन का क्या हश्र होता है इसके बारे में कभी किसीने नहीं सोचा।" माई के मुंह से ये फलसफेनुमा बातें सुन कर मैं दंग रह गई। चाय की चुस्की लेते हुए माई इस तरह बोल रही थी मानो बीती हुई ज़िंदगी की कड़वी यादों के घूंट पी रही हों। 
"तारा, तुम पढ़ी लिखी हो, नौकरी करती हो, तुम्हारे हाथ में सत्ता है, सो तुम पति को कोर्ट में खींच सकती हो। मैंने और तुम्हारी अम्मा ने क्या किया? मैं बाप की उम्र के आदमी की बीबी बनी, उस वक्त मुझ पर क्या बीती होगी? क्या कभी तुमने इस बारे में सोचा है? नहीं, तुम्हें इस बात का खयाल ही नहीं है। तुमने कहा था कि सोनबावडी की औरतें हंसते-खेलते घरों में आग लगाती हैं। लेकिन तारा, औरतें आग नहीं लगाती हैं, आग लगाते हैं आदमी। अपनी बच्चियों को किसीके भी हाथों बेच देते हैं। किसीकी नन्ही बच्ची को भी ब्याह लाते हैं। यह सब बंद होना चाहिए। तारा, जो तुम आज कर रही हो वह मैं भी करना चाहती थी। शौकिया दो-दो शादियां करनेवालों को सबक सिखाना चाहती थी। कुछ करना चाहिए ऐसा मुझे भी लगता था। लेकिन मैं ठहरी अनपढ़-गंवार। मेरे पास न शिक्षा थी न सत्ता। लेकिन तुम कर सकती हो, इसलिए मुझे तुम पर नाज़ है।" 
"मैं जानती हूं कि कोई भी तेरी तरफ से बोलनेवाला नहीं है क्योंकि, पढने-लिखने के बावजूद तुम एक औरत ही हो। इसलिए, तुम्हारे भाई ने, सदाशिव ने भी झूठी गवाही दी। लेकिन तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हारे  साथ हूं। जंवाईबापू ने दूसरी शादी की इसका सबूत तुम्हें चाहिए था ना? मैं लाई हूं।" माई ने अपनी थैली में से कागज निकाला और मेरे हाथ में रख दिया। कहा, "जिस पुरोहित ने तुम्हारे पति की शादी रचाई उससे मैं लिखा कर लाई हूं यह कागज। ये लो और अब अपने भाई का और पति का जो करना है सो करो।" 
"तारा, ऐसे क्या देख रही हो? तुम्हारा पति शादी रचा कर इनकार कर रहा है। उसने तुम्हारे बारे में नहीं सोचा। यह तो चलो ठीक है। लेकिन जिसके साथ उसने शादी की उसके बारे में भी सोचा है?उसके साथ शादी की बात को अगर वह आज झूठ करार दे रहा है तो फिर किस रिश्ते से वह उसे अपने साथ रख रहा है? अपनी रखैल बना कर?"
माई का सवाल सुन कर, उनका लाया सबूत देख कर मैं दंग रह गई। दरवाजे की बेल बजी, बाहर वकील खड़े थे और मैं अचंभित सी माई की तरफ बस देखती रह गई। 
---

Saturday, May 22, 2010

1. मोल लिया सिरदर्द

                                                                    -संध्या पेडणेकर
पुलिस की नौकरी में एक हवलदार को भी कितना हाजिरजवाब होना पड़ता है, कैसे कैसे पापड बेलने पड़ते हैं इसका उदाहरण था रामाचारी. उन दिनों मेरी तैनाती बेंकनहल्ली पुलिस स्टेशन में हुई थी. रामाचारी वहां हेड कांस्टेबल था. स्टेशन उसके अधीन था. छोटे गावों में हेड कांस्टेबल की भी बड़ी इज्जत होती थी उन दिनों. तिस पर रामाचारी जैसा हेड कांस्टेबल हो तो क्या कहने!

बेंकनहल्ली में उन दिनों कुल मिला कर दस लोगों का स्टाफ था. घर जैसा माहौल था. दो सालों में उस गाँव में कोई ख़ास वारदात नहीं हुई थी. स्टाफ घर से युनिफोर्म पहन कर निकलता और दफ्तर में आकर उसे खोल कर खूटी से टांग देता.

एक बार चंद्रू कांस्टेबल से मैंने इस बारे में पूछा, 'यार चंद्रू , पुलिस स्टेशन में इस तरह कच्छे-बनियान में तुम लोग बैठे रहते हो, अच्छा लगता है क्या?

तब चंद्रू ने कहा था, `क्या है साब, यहाँ गाँव में हैं कितने लोग? युनिफोर्म पहनो या न पहनो, कांस्टेबल तो कांस्टेबल ही रहेगा ना! युनिफोर्म पहनता है इसलिए कोई उसे इंस्पेक्टर नहीं बनाएगा. और नहीं पहनता इसलिए वह भंगी तो नहीं बनेगा? क्या?'

उसकी बात सुन कर क्या बोलूं मेरी समझ में नहीं आया. मैं चुप रहा तो वह बोला, `एक बात बताता हूँ आपको, वह पुलीस पाटील शिंदे है ना, उसकी बेटी की शादी में  उसने बैंक से पैसा निकाला और घर में ही रखा. रात में चोर घुस गया उसके घर. उसने हल्ला मचाया. स्टेशन में रामाचारी ड्यूटी पर था. बेचारा. तभी घर से खाना खाकर आया था. युनिफोर्म खोल कर स्टेशन में अपनी कुर्सी पर टिका ही था कि शिंदे चिल्लाता हुआ आकर खडा हो गया. रामाचारी ने आव देखा ना ताव. झट डंडा उठाया और दौड़ पडा चोर को पकड़ने के लिए. कच्छे-बनियान में रामाचारी दौड़ रहा था और आगे चोर सर पर पैर रख कर भाग रहा था. आखिर पकड़ ही लिया रामाचारी ने उसे. और ये पिटाई की कि पूछिए मत. इस पूरे चक्कर में रामाचारी के युनिफोर्म में ना होने से कोई फर्क नहीं पडा!'

जो बात चंद्रू ने कही थी वाही बात स्टाफ के अन्य लोगों ने भी कही कि युनिफोर्म में ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. इसलिए मैंने दफ्तर में भी इन सब लोगों को कच्छे बनियान में देखने कि आदत डाल ली.

एक दिन सुबह सुबह मैं ड्यूटी पर रिपोर्ट कर ही रहा था कि गाँव का एक रईस आदमी रोता-चिल्लाता आया. मुझे लगा शायद चोरों ने उसका घर लूट लिया होगा. लेकिन उस आदमी की शिकायत कुछ और ही थी. उसने कहा, `मेरा मुर्गा गुम गया है!'

मैं चुप रहा. इस बात पर कोई प्रतिक्रया देना जरूरी भी है, मुझे नहीं लगा. लेकिन वह आदमी बड़ा दुखी था. कहने लगा, `मेरे मुर्गे जैसा कोई मुर्गा आसपास के गाँव में नहीं था. हर साल मुर्गों कि टक्कर में मेरा मुर्गा ही जीतता था. इसलिए सबकी नजर मेरे मुर्गे पर थी. मौक़ा पाकर आज शायद किसीने मेरा मुर्गा उड़ाया है.'

इस पर मुझे क्या कहना चाहिए मेरी समझ में नहीं आ रहा था.

कुछ देर मेरी तरफ घूर घूर कर देखने के बाद वह बिफर कर बोला, `अबे ओ हवलदार! रपट लिख!!'


मैं  भौंचक देखता रहा.इतने में हाफ्ते हुए आये रामाचारी ने उसे एक तरफ ले जाते हुए कहा, `मैं जानता हूँ क्या हुआ आपके साथ. बहुत बुरा हुआ. आपका बहुत नुक्सान हुआ होगा. आइये, मैं रिपोर्ट लिख लेता हूँ.' 

फिर रामाचारी ने एक एक बात कि तफसील से रपट लिखवा दी. उस अमीर आदमी को तसल्ली देकर घर लौटाया कि पुलिस एक दिन में उसका मुर्गा खोज कर ले आएगी. आखिर पुलिस है किस लिए? जनता के लिए ही ना? किसी का मुर्गा गुम जाए और पुलिस ढूंढ ना सके तो... लानत है ऐसी पुलिस पर!'

रामाचारी की लच्छेदार बातों से वह आदमी खुश हुआ. जाते हुए उसने सौ रुपयों का एक पत्ता रामाचारी के हाथ पर टिकाया  और कहा, `चाय पी लेना साब! मुर्गा मिलेगा तब खाना खिलाऊँगा.'

और वह चला गया. उसके जाने के बाद हर रोज कि तरह रामाचारी ने उनिफ़ोर्म खोला. अपनी जगह बैठने से पहले उसने एहतियात से सादे कागज पर लिखी रिपोर्ट को फाड़कर फ़ेंक दिया. मैंने पूछा, `वह फिर पूछने आएगा तो?'

`अरे, देंगे कोई जवाब. इतने से गाँव में उसका मुर्गा गुम कैसे जाएगा?'

मैंने पूछा, `फिर तुमने रिपोर्ट कैसे लिख दी?'

रामाचारी बोला,`वरना चाय के लिए पैसे कहाँ से मिलते? तनखा सारी तो एक तारीख को बीवी के हाथ में चली जाती है. फिर साली एक सिगरेट भी खरीदनी हो तो ऐसे ही जुगाड़ भिडाना पड़ता है.'

मैं अभी भी आशंकित था. मैंने फिर उससे पूछा, अगर वह फिर पूछने आये तो?'

रामाचारी बोला, `तुम्हें क्या लगता है? सोने की कलगी वाला था उसका मुर्गा जो हमारे ढूँढने से मिल जाएगा? आखिर उसका मुर्गा- काला, गोरा, लाल, पीला कैसा था यह हम में से देखा किसने है? अगर किसीने उड़ाया हो तो अब तक तो खा-पी कर उसे वह हजम भी कर गया होगा. बेकार की चिंता छोडो और काम में लग जाओ.'

मेरे मन का कीड़ा लेकिन सुगबुगाता ही रहा.

इस घटना को दो-चार दिन बीते होंगे. हर रोज वह अमीर आदमी पुलिस स्टेशन आता और रामाचारी उसे बहलाकर वापिस भेजता. कभी वह तुरंत मुर्गा ढूँढने के लिए उसीके साथ निकलता. नुक्कड़ तक उसे छोड़ कर फिर स्टेशन लौट आता. हर रोज वह आदमी खाने-पीने के लिए बीस-पच्चीस रूपये खुद निकाल कर रामाचारी को दे देता और  इस तरह रामाचारी की दीवाली मन रही थी. एक दिन वह आदमी जब भड़क गया तो रामाचारी चुपके से बाजार से एक तगड़ा मुर्गा ले आया. मैंने कीमत पूछी तो बोला, `पुलिसवाले से भी कोई पैसा लेता है क्या? और मैं तो ठहरा ईमानदार आदमी. कुछ देर बाद लौटाने के वायदे पर ले आया हूँ.'

`और इस मुर्गे के मालिक ने तुम्हारे वादे पर तुम्हे मुर्गा दे दिया?'

`मालिक नहीं मालकिन - गंगम्मा. बड़ी तेज औरत है. और देती क्यों नहीं? जिस दिन जरा ज्यादा हो जाती है तो रात का खाना मैं उसी की खानावली में खाता हूँ और वहीँ बरामदे में सो जाता हूँ. वह जानती है की मैं शाकाहारी हूँ. उसके मुर्गे के लिए कोई खतरा नहीं है मुझसे.'

मैंने पूछा, लेकिन, यह मुर्गा तुम लाये क्यों हो?'

उसने कहा, `देखते जाओ!'

थोड़ी ही देर में वह अमीर आदमी अपने मुर्गे के बारे में पूछताछ करने आया. रामाचारी ने बड़े प्यार से उसे बिठाया और कहा, `साब, खुशखबरी है. आपका मुर्गा मिल गया.'

वह आदमी एकदम से उछल पडा. उसने कहा, `कहाँ है? दिखाओ!'

दोनों टाँगे बांधकर मुर्गे को पुलिस स्टेशन के एक कोने में रखा हुआ था. दुबक कर बैठे मुर्गे को टांग से पकड़कर रामाचारी उठाकर लाया. मुर्गे पर नजर पड़ते ही वह आदमी चौंका. उलटे टंगे मुर्गे को गर्दन टेढ़ी कर देखते हुए वह बोला, `अरे! आखिर तुम्हे मुर्गा मिल ही गया.!!'

अब चौंकने की बारी रामाचारी की थी. मैं भी चौंक गया था. एक पल को लगा कि शायद यह आदमी खुद ही अपने मुर्गे को काट कर खा गया होगा और झूठी रपट लिखाने आ गया. लेकिन ख़ुशी में आकर रामाचारी ने कहा, `क्या, सच? आप ही का मुर्गा है ना ये?'

`तुम्हें नहीं मालूम? फिर तुमने इसे पकड़ा कैसे?' उस आदमी ने पूछा.

संभलकर रामाचारी ने कहा, `साब, झूठ  क्यों बोलूं? आपने चोरी की रपट लिखाई उसके बाद से ही मैं आपके मुर्गे के बारे में सुनता आया हूँ. मैंने खुद आपके मुर्गे को कभी देखा नहीं. आपने इतना हुबहू वर्णन किया था कि ढूंढ कर इसे पकड़ना मेरे लिए आसान हो गया. पर मन में शक तो था ही कि अगर यही आपका मुर्गा नहीं हुआ तो....आप तो नाराज हो जायेंगे मुझसे!
इसीलिए....!!!'

`अच्छा, ठीक है. यही है मेरा मुर्गा. मैं इसे ले जाता हूँ.'

रामाचारी फिर मुश्किल में आया. उसे वह मुर्गा लौटाना भी था. उसने उस आदमी से लाख कहने की कोशिश की कि अभी इस केस से संबंधीत कार्रवाई पूरी नहीं हुई है. कार्रवाई पूरी होते ही मैं खुद आपका यह मुर्गा आपके घर पहुंचा आऊँगा......' लेकिन उस आदमी ने एक नहीं मानी. कहा, कारवाई जो भी होगी वह तुम पूरी करना. और घर आकर मेरे हस्ताक्षर भी लेना.'

रामाचारी खुशामदी स्वर में बोला, `वह क्या है साहेब, इतना मुश्किल था आपके मुर्गे को ढूंढना. कित्ती मेहनत की है हम सबने मिलकर.. आप तो ऐसे ही चले जा रहे हैं....'

वह आदमी बोला, `रामाचारी, तुमने मुझे क्या पागल समझ रखा है? यह मेरा लड़नेवाला मुर्गा ना होता तो मैं इसे ढूंढवाने नहीं आता. और ना तुम्हें चाय-पानी देता रहता. जितना पैसा दे चुका हूँ उतना बहुत है.' मुर्गा उठाकर फिर वह चला गया.

लेकिन पांच मिनट के बाद फिर लौट आया और बोला, `अछा ठीक है. ये लो पांच रुपया. और, आगे भी इसी तरह काम करते रहना.' उसकी बगल मैं दब कर बैठा मुर्गा अपने को लेकर हो रहे इस पूरे मुर्गायन से बेखबर  झपकियाँ ले रहा था.

उसके जाने के बाद टेबिल पर रखा पांच रूपये का नोट उठा कर उसे उलट पुलट कर रामाचारी देखने लगा. शायद उसके दिमाग में कोई नया प्लान पैदा हो रहा था. मैंने उससे पूछा, `क्यों रामाचारी, तुम्हारे नोट की तरह यह नोट भी झूठा है क्या?'

रामाचारी ने एक लम्बी उसांस छोड़ी और कहा, `एक किस्सा ख़त्म और दूसरा किस्सा शुरू.'

मैंने पूछा, `क्या मतलब?'

वह बोला, `मतलब यही कि ये मुर्गा कम से कम तीस रुपये का था. उसे वह ले गया. अब गंगाम्मा को मैंने दो घंटे के भीतर मुर्गा नहीं लौटाया तो वह मुझे कच्चा चबा जायेगी. या तो उसका मुर्गा, या फिर उसका पैसा मुझे देना पड़ेगा. और यह आदमी तो पांच का पत्ता थमा कर चला गया. अब बाकी के पच्चीस रूपये मैं कहाँ से लाऊं?'

गंगाम्मा को रामाचारी ने कैसे लपेटा  मैं नहीं जानता क्यों कि वह अपने मुर्गे की खबर लेने पुलिस स्टेशन नहीं आयी. लेकिन दो-चार दिनों बाद वही आदमी एक बार फिर पुलिस स्टेशन आ धमका. अबकी उसके साथ हमारा सीनियर इंस्पेक्टर भी था. आसपास के पूरे गाँव में लोग उसका नाम सुन कर ही भाग खड़े होते. इसलिए नहीं कि वह बहुत कड़क था, बल्कि इसलिए कि वह गाली से बात शुरू करता और गाली पर ही ख़त्म भी करता. उसके पास एक से बढ़कर एक गालियों का भयंकर खजाना था. ऐसी गालियाँ कि शातिर से शातिर भी गश खा जाये.

आते ही वह शुरू हो गया. `....कहाँ है वह .....राम्या? .....मेरे साले को उल्लू समझ रखा है क्या? .....ने?!!!'

इसके बाद घंटे भर तक पुलिस स्टेशन नौटंकी का अड्डा बना था. गाँव के लोग भी बाहर खड़े होकर श्रवणसुख ले रहे थे. रामाचारी बीच बीच में `में में में में' कर रहा था.

आखिर किसी तरह मामला निपटा. और वे लोग चले गए. उनके जाने के बाद रामाचारी का भिन्नाना स्वाभाविक था. उस अमीर आदमी ने अपने सालेसाहब से कहा था कि उसने मुर्गा ढुंढवाने  के लिए रामाचारी को पांच सौ रुपयों की घूस दी है. इंस्पेक्टर घूस की वह रकम वापिस चाहता था. भयंकर गालियों के बीच वह रामाचारी से पांच सौ रूपये वापिस लौटाने के लिए कहता और रामाचारी तुरंत कहता, `साब, वह मुर्गा मैं किराए पर ले आया था साब, वह मुर्गा दे देना.'

मजे की बात यह थी कि उस आमिर आदमी के मुताबिक़ मुर्गा उसने अपने एक नौकर के हाथ उसी दिन, जैसे ही उसे पता चला कि वह उसका खोया हुआ मुर्गा नहीं है, पुलिस स्टेशन भेज दिया था. वह नाराज इसीलिए था कि रामाचारी ने उसके बाद आकर ना तो उससे बात की, ना ही उसका मुर्गा ढूंढ निकाला और न ही अपना मुर्गा लौटाने के लिए धन्यवाद कहा. जिस नौकर के हाथों मुर्गा भेजा गया था उसे बुलाया गया लेकिन वह किसी काम से शहर चला गया था. इसलिए मामले का तभी निपटारा नहीं हुआ. बस, रामाचारी को उस आदमी के दिए रूपये लौटाने नहीं पड़े. रामाचारी के लिए इतना काफी था.

उनके जाने के बाद रामाचारी बैठा भिन्ना रहा था.....,`....जिंदगी में पहले कभी इतनी गालियाँ नहीं खायीं मैंने.....', कसम खा खा कर वह बार बार यही कह रहा था.

अभी वह इस सदमे से निकला नहीं था कि पुलिस स्टेशन के बाहर किसी के धाड़ें मार कर रोने की आवाज सुनाई दी.`अब कौन सी नयी मुसीबत आन पड़ी?.....' कहते हुए लाठी उठा कर वह बाहर निकला. उसके पीछे पीछे हम सब लोग भी बाहर निकले.

बाहर एक किसान अपने बैल के साथ खडा था. वह इस तरह धाड़ें मार कर रो रहा था मानो उसके किसी प्रिय की अचानक मौत हो गयी हो. कभी वह अपना माथा जोर जोर से पीट रहा था, कभी बैल को मारने की मुद्रा बना रहा था. बैल निर्विकार जुगाली करता हुआ खडा था. किसान तैश में आकर उसे धक्का देता तो वह थोड़ा सा हिल भर जाता. और बस.

भिन्नाया हुआ रामाचारी दहाड़ा, `क्या तमाशा लगा रखा है? पुलिस स्टेशन है ये, तुम्हारे बाप का घर नहीं.'

किसान के कानों में रामाचारी की आवाज घुस गयी. उसने पीछे मुड कर देखा. रामाचारी के तेवर देख कर वह सहम गया. रिरियाती आवाज में बोला,`हुजूर, मैं तो लुट गया, बर्बाद हो गया. रपट लिखवानी है......'

रामाचारी दहाड़ा, `आज नहीं बे, कल आना. फुट ले यहाँ से.'  

`नहीं साब, आज आपको कम्प्लेंट लेना ही पडेगा मेरा.'

`कंप्लेंट? कैसा कंप्लेंट? किधर डाका पड़ा, चोरी हुई कि कत्ल हुआ?'

`अब क्या बताऊँ साब, चोरी ही हुई समझो!'

रामाचारी फिर दहाडनेवाला था लेकिन कांस्टेबल वीरप्पा को धाड़ें मार कर रोते उस किसान पर शायद दया आयी. उसने कहा, `मैं देखता हूँ क्या है, आप अन्दर जाइए.'

फनफनाता रामाचारी अंदर गया और धस्स से कुर्सी खिसका कर बैठ गया और उसने टेबल पर टांगें फैला लीं. वीरप्पा और उसके साथ दफ्तर के हम बाकी सभी लोग पुलिस स्टेशन की सीढियां उतर कर आये.

किसान अब सर पकड़ कर अपने बैल के पास ही जमीन पर बैठा हुआ था. वीरप्पा उसके पास जाकर बैठ गया. सहानुभूति से उसने पूछा, `सिद्रामय्या, हुआ क्या? क्यों इस तरह दिल छोटा कर रहे हो?'

सिद्रामप्पा ने आँखे उठा कर वीरप्पा को देखा. उसकी पनियाई, कीचडभरी आँखों में उदासी छाई हुई थी. रुक रुक कर वह बोला, `वीरप्पजी, मैं लुट गया.' फिर उसकी आँखों से आंसुओं की झड़ी लगी.

`क्या हुआ बताओ, किसने तुम्हें लूटा?'

सिद्रामप्पा फिर अचकचाकर उठा. हाथ कि लाठी से वह अपने बैल को अन्दाधुंद पीटने लगा. साथ ही कहता जा रहा था, `इसने....इसीने मुझे लूटा. बर्बाद कर दिया. छोडूंगा नहीं मैं इसे...'

हम सब भौंचक थे वीरप्पा ने उठकर उसका हाथ थामा. उसे एक तरफ ले गया. पानी पिलाया और पूछा कि माजरा क्या है?

किसान कि कहानी सचमुच दर्दनाक थी. उसने बताया, `पिछले चार दिनों से मैं लगातार अपनी इस बार की फसल शहर में  अढ़तिये को दे रहा था. आज आखरी खेप थी. इसलिए उसने पूरी फसल का भुगतान कर दिया. फसल डाल कर पैसे लेने में काफी देर हुई थी. इसलिए मैंने सोचा, चलते चलते रास्ते में जहां नदी पड़ती है वहीँ रोटी खा लूंगा. नोटों की गड्डी  मैंने रोटी की गठरी में ठूंस कर रख दी और चल दिया. नदी किनारे पहुँच कर मैंने रोटी की गठरी पेड़ के नीचे रखी. बैल को खोला. सोचा, हाथ-मुंह धोकर पानी लेता आऊँ फिर रोटी खाऊंगा. रोटी की गठरी वहीँ छोड़ मैं लुटिया लेकर चला. आते हुए देखता क्या हूँ, मेरे बैल ने.....मेरे अपने बैल ने रोटी की गठरी खा ली थी सरकार.... घास चरने के लिए मैंने उसे खुला छोड़ रखा था और उसने मेरी रोटियाँ ही चबा लीं. दूर से मेरी उस पर नजर पड़ी, उसके मूंह से रोटी की गठरी के कपडे का टुकडा दिखाई दे रहा था. पागल की तरह मैं दौड़ा. लेकिन मेरे पहुँचने तक देर हो गयी थी. कपडे के साथ रोटियाँ, और मेरी कड़ी मेहनत की कमाई सब इसके पेट में चला गया था......'

बोलते बोलते सिद्रामप्पा का दुःख एक बार फिर उमडा. वह फिर धाड़ें मार मार कर रोते हुए चिल्लाने लगा, `इसीने लूटा है मुझे, पकड़ लो इसे...गिरफ्तार कर लो....छोड़ना नहीं...पीट देना साब.....'

हम सब ठगे से सिद्रामप्पा के बैल की तरफ देखते रह गए. वह बेचारा एकदम निरीह लग रहा था. जुगाली कर रहे उस बैल के मुंह से झाग गिर रहा था. रुपयों का झाग कैसा होता है यह मैंने जिंदगी में पहली बार देखा.

हम सब को निस्संशय सिद्रामप्पा से सहानुभूति थी. लेकिन सवाल यह था कि अब इस पूरे माजरे का क्या किया जा सकता है? बैल ने सिद्रामप्पा के रुपये भले खाएं हों लेकिन उसे चोर करार दे कर उस पर कारवाई तो नहीं की जा सकती थी. यह बात हमने सिद्रामप्पा को समझाने की कोशिश की लेकिन वह गुस्से से बौराया हुआ था. एक ही बात की रट  लगाए जा रहा था, `बैल पर एक्शन लो!!'

और अन्दर रामाचारी भिन्नाया बैठा था.

आखिर हमने उसीसे कोई रास्ता निकालने की बिनती की.

पूरा किस्सा सुनने के बाद वह दनदनाता हुआ बाहर निकला और दहाड़ा, `कहाँ है वह एहसानफरामोश बैल? चोरी करता है? आज तक किसी जानवर ने चोरी नहीं की, इस कमीने ने की. वह भी अपने ही मालिक के घर! उसका सारा पैसा खा गया?'

फिर सिद्रामप्पा की ओर मुड कर वह बोला, `चिंता मत कर सिद्रामय्या, मैं हूँ ना! तुम्हारे इस बैल को सबक सिखाना ही पडेगा.'

फिर हमारी तरफ मुड कर रामाचारी बोला, `वीरप्पा, जाओ, ज़रा रस्सी लेकर आना. मजबूत रस्सी लाना. चोर बैल को गिरफ्तार करना है.'

रो रहे सिद्रामप्पा को अचानक झटका लगा. झटके से मानो उसके होश ठिकाने आ गए. झिझकते हुए उसने पूछा, `क...क्या करेंगे आप इसका?'

रामाचारी ने पूरे रौब के साथ कहा, `गिरफ्तार करेंगे और क्या?  तू डर मत सिद्रामय्या, मैं हूँ ना! इसे अगर छोड़ देंगे तो ये और जानवरों को भी चोरी करना सिखा देगा. इसलिए इसे सबक सिखाना जरूरी है.'

`वो ठीक है, लेकिन आप इसका करेंगे क्या?' सिद्रामप्पा जानना चाहता था.

रामाचारी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ` कुछ नहीं, इसे ऐसा पाठ पढ़ाएंगे कि जिंदगी में फिर कभी चोरी नहीं करेगा. पहले गिरफ्तार करेंगे, फिर केस कर देंगे. कोर्ट में इसे पेश करेंगे. तू गवाही देने के लिए आना. फिर जज इसे सजा सुनायेंगे. कम से कम पांच साल कि सजा होती है चोरी की. पांच साल जेल में चक्की पीसेगा, तो होश ठिकाने आ जायेंगे तेरे इस नामुराद बैल के.'

`अच्छा? वीरप्पा, इसका केस लिख लेना. और हाँ, बैल तुम्हारा ही है. इसलिए इसके चारे-पानी का खर्चा भी जमा करते जाना. मैं काम से जा रहा हूँ. वीरप्पा, अंदर से मेरी टोपी ले आना ज़रा.....' कहते हुए रामाचारी पुलिस स्टेशन के अहाते से निकल गया. वीरप्पा ने अंदर टेबिल पर पड़ी उसकी टोपी दौड़ कर उसे पकड़ा दी.

सिद्रामप्पा भौंचक खडा था. अपनी शिकायत का इसतरह उलटा असर होगा उसने शायद सोचा नहीं था. यह तो, रूपया गया, बैल जाएगा और ऊपर से दक्षिणा भी देनी पड़ेगी वाली बात हुई. अब उसके होश ठिकाने आये. उसने सोचा, बैल नहीं होगा तो अगली फसल की बुवाई कैसे होगी? सारी कमाई तो उसने उडाई ही थी, अब उस पर मुकदमा चलाने और मुकदमे के दौरान उसके खाने-पीने का खर्चा भी देना पडेगा?!

कागज लेने के लिए अंदर गए वीरप्पा के पीछे पीछे सिद्रामप्पा भागा. उसने उसके पैर पकड़ लिए. कहा, `माफ़ करना साब, गलती हुई.

वीरप्पा ने बनाते हुए कहां, `अरे, तुम क्यों माफ़ी मांग रहे हो? गलती तो तुम्हारे इस बैल ने की है.'

सिद्रामप्पा ने कहा, नहीं साब, उसने जान बूझ कर तो नहीं किया यह. गलती तो मेरी थी. मैंने यह सोचा ही नहीं कि बैल रोटी की गठरी खा सकता है! और, वह कोई रुपया रखने की जगह है? फिर.. बैल तो साब मेरा ही है, मैंने सोचा है कि.....कि उसे माफ़ ही कर दूँ. उस पर केस करूंगा तो मेरा हल कौन खींचेगा?'

फिर ये सब तुमने पहले क्यों नहीं बोला? अब साब ने कहा है केस लिखो. वो आकर पूछेंगे तो मैं क्या कहूँगा?'

`कुछ भी कहो साब, मेरे बैल को छोड़ दो. उसकी कोई गलती नहीं. मैं फिर कभी बैल की रपट लिखाने नहीं आऊँगा.'

`अछा, जा. मैं बात करता हूँ साब से.' वीरप्पा ने कहा तो कृतद्न्यताभाव से सिद्रामप्पा अपना बैल हाँक कर ले गया.

उसके जाने के बाद हमने वीरप्पा से पूछा, `अब रामाचारी पूछेगा तो क्या जवाब देगा?'

वह बोला, रामाचारी ने ही कहा था, बैल को कैद करने की बात सुन कर उसके होश ठिकाने आ जायेंगे. माफ़ी मांग लेगा तो छोड़ देना उसे.'

हम सब ने छुटकारे की सांस ली. रामाचारी की समयसूचकता के हम कायल हुए.
---