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Friday, June 25, 2010

2. औरतजात

मूल मराठी कहानी -उर्मिला पवार 
हिंदी अनुवाद -संध्या पेडणेकर
(पूर्व प्रकाशित)
वकील साहब को कोर्ट में आता देख मैं और सदाशिव उठ कर उनके पास चले गए. सदाशिव से उन्होंने कहा, ` आप कब आये?' 
`अभी अभी आ रहा हूँ,'  सदाशिव ने कहा.
`सबूत लाये हो?'  उन्होंने पूछा.
ना में गर्दन हिलाते हुए सदाशिव ने कहा, `मैंने कोशिश की, लेकिन कोई कुछ कहने के लिए तैयार नहीं है. जिस पुरोहित ने शादी करवाई वह भी बात को टाल गया....' पता नहीं सदाशिव सच बोल रहा था या झूठ, लेकिन वकील साहब ने भौहें तानते हुए कहा, `ठीक है, जो सबूत उपलब्ध हैं वाही पेश करेंगे. वह, टूटा हुआ ताला तो है ना?'
पर्स में रखा हुआ ताला टटोलते हुए मैंने हामी भरी. वकील साहब ने पूछा, `और वह पड़ोसन आयी है? '
`साब, वह डरती है. उसके पति ने उसे धमकाया है. ताला तोड़कर प्रभाकर घर में घुसा और उस वक्त उसके साथ कोई दूसरी औरत थी यह बात किसीसे ना कहने की उसे सख्त हिदायत दी गयी है,'  मैंने कहा. 
`तो सब भगवान् भरोसे है, क्यों? ठीक है, हम उसे सम्मन भेजेंगे. अगली तारीख लेंगे. आज सदाशिव की गवाही लेंगे. तब तक मैरिज सर्टिफिकेट......' मैंने गर्दन हिला कर हाँ कहा और हारे हुए खिलाड़ी की तरह निराश होकर मैं बेंच पर बैठ गयी. मेरे पास आते हुए लगभग धमकाने वाले अंदाज में सदाशिव ने कहा, `बाबा ने कहा है, अभी भी सोच लो. केस वापिस ले लो. अपने यहाँ आज तक किसी औरतजात ने अपने पति पर केस नहीं ठोंका है, खासकर तलाक का!'
मुझे गुस्सा आया. मैंने लगभग चिल्लाते हुए कहा, `क्यों मेरा दिमाग चाट रहे हो? शादी का सबूत लाने के लिए रुपया देकर तुम्हें गाँव भेजा था. क्या किया तुमने? कुछ नहीं. खाली हाथ वापस लौट आये. और यहाँ बैठ कर मुझे धमका रहे हो. निकल जाओ यहाँ से.'  वह सचमुच उठ कर चलता बना. मैं देखती रह गयी. वह सामने वाले होटल में जाकर बैठ गया. अब मेरे ही पैसे से वह ठूंस कर खायेगा.
सदाशिव मेरा भाई है, सौतेला भाई होने के बावजूद मैंने उसे कभी सौतेला नहीं माना। एक ही घर में पैदा हुए, बढे। मेरी गोद में वह पला-बढा। कहते हैं, साथ साथ रहने से प्रेम बढता है, लेकिन प्रेम सिर्फ मेरे ही मन में बढा। सदाशिव के मन में बढा ही नहीं। ऐसा क्यों? असल में मुझे उस पर गुस्सा होना चाहिए था। मेरे बाबा के प्यार में वह और उसकी मां हिस्सेदार बन कर जो आए थे।
सम्मन लेकर प्रभाकर को घेरने में सदाशिव की मदद जरूर मिली थी। प्रभाकर ने पहले कई बार सम्मन की तारीख पता कर झांसा दिया था। लेकिन सदाशिव उसे कहीं भी घेर लेगा यह जब उसने जाना तब वह चुपचाप नोटिसें लेने लगा।
दोपहर की चिलचिलाती धूप में सूनी आंखों से सामने देखते हुए बैठी थी कि अचानक पान के ठेले पर खडा सदाशिव दिखाई दिया। किसी से बतियाते हुए वह पान चबा रहा था और सिगरेट के छल्ले हवा में उछाल रहा था। वह जिससे बात कर रहा था वह ...प्रभाकर था शायद! मेरी तरफ उसकी पीठ थी। प्रभाकर के साथ उसकी बीबी थी, मेरी सौत. कोर्ट में भी वह खुल्लमखुल्ला प्रभाकर के साथ घूम रही थी, मानो मुझे और कोर्ट को चुनौती दे रही थी – साबित कर लो कि हमारी शादी हुई है, ठेंगे से! सदाशिव न जाने किस बात पर उनके साथ खडा बतिया रहा था और अपनी बत्तीसी दिखाते हुए हें हें कर हंस रहा था। पल भर के लिए मेरा दिमाग भिन्ना गया।
सदाशिव सबूत लाने के लिए गांव गया था। लेकिन वहां जाकर उसने गांव के लोगों की बैठक ली। बैठक में निर्णय लिया गया कि बच्चा पैदा होने तक मैं उन दोनों को अपने घर में ठौर दूं। बच्चा पैदा होते ही वे दूसरी जगह रहने चले जाएंगे।
मैं कैसे यह बात मानती? दो पत्नियों के बीच एक पति वाली तिकोनी गृहस्थी मुझे नहीं चाहिए थी। उन दोनों का साथ साथ उठना-बैठना मैं कैसे देख पाती? इसलिए मैंने निर्णय किया था कि जब प्रभाकर ने उसके साथ शादी की है तो वे दोनों अलग घरबार लेकर रहें। मेरे घर में अब वे नहीं रहेंगे। मेरी अम्मा ने जो सहा था वही सब सहने की ताकत मुझमें नहीं थी।
मेरे पैदा होने के बाद अम्मा के कोई और बच्चा नहीं हुआ। इसलिए मैं दस साल की थी तब बाबा ने दूसरी शादी की। इसतरह माई घर आई। अम्मा ने बडे दिल से माई को स्वीकारा। अपने परिवार में उसके लिए जगह बनाई। लोग अम्मा की तारीफ करते। कहते – ''औरत हो तो तारा की मां जैसी हो। सौत के साथ अपनी छोटी बहन जैसा व्यवहार है  उसका।" सुन कर अम्मा हंस देती लेकिन लगता जैसे रो रही हो। अम्मा की हालत देख मुझे माई पर गुस्सा आता। बाबा पर भी गुस्सा आता। दो शादियां करनेवाले सभी पुरुषों और उनकी दो नंबर की बीवियों से मुझे नफरत थी।
मुझे लगता औरतें ही औरतों के घर तोडती हैं। ऐसे कई पुरुष हमारे रिश्तेदारों में थे जिन्होंने मामूली सी वजहों से दुबारा शादी रचाई थी। बच्चा नहीं है, बच्चे हैं लेकिन बेटा नहीं है, घर में काम करने के लिए औरत नहीं है, किसी औरत का कोई सहारा नहीं है, किसी के बगैर चैन नहीं आता, कोई मन को भा गई इन जैसी वजहों से पुरुष दूसरी या तीसरी शादी करने में हिचकते नहीं थे। लेकिन कभी मेरा पति भी यह करेगा मैंने नहीं सोचा था। प्रभाकर पढा-लिखा है, नौकरी करता है और कार्यकर्ता है। लेकिन शादी के चार-पांच साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ तो उसका स्वर भी शिकायती हो आया। मेरे ससुरालवालों ने और मायकेवालों ने भी उसे दूसरी शादी की सलाह देनी शुरू कर दी। 
रात-दिन सभाओं, मोर्चों, शिविरों, लोगों के सरकारी काम करवाते, कार्यकर्ताओं से मिलने आदि में प्रभाकर का दिन बीतता। फुर्सत से बातचीत करने या कुछ तय करने के लिए उसके पास समय ही नहीं रहता था। घर लौटते ही बाहर के सारे कामों की थकान वह बच्चा न होने का बहाना बना कर मुझ पर उतारता। धीरे धीरे यह रोजमर्रा की बात हुई। मैं भी तंग आ गई। प्रभाकर के पीछे पड कर मैंने अपना और उसका चेकअप करवा लिया। दोनों की रिपोर्ट बिल्कुल नॉर्मल थी। पता नहीं बात कहां अटक गई थी। प्रभाकर से मैंने कहा कि हम दूसरे डॉक्टर को दिखाएंगे। साथ में, मैंने उसे दौरे कम कर घर पर ध्यान देने के लिए भी कहा। लेकिन उसने कभी मेरी बात नहीं मानी। उल्टे, बच्चा नहीं है इसे मेरा कसूर मान कर चिढता, झगडता, दूसरी शादी की बात करता। मेरे पिता की, और कइयों की दो-दो शादियों का जिक्र करता। 
एक दिन बिना कुछ कहे प्रभाकर गायब हो गया। पंद्रह दिनों बाद वह लौटा। सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से उसका घूमना-फिरना बदस्तूर जारी था। इसलिए मुझे कोई शक नहीं हुआ। इसी दौरान उसके एक दोस्त ने आकर खबर दी कि वह गांव गया है। 
प्रभाकर लौटा तो मैंने उसे गुस्से से पूछा, "इतने दिन कहां थे? हमेशा, हर-वक्त घर से बाहर क्यों रहते हो?" वगैरा। जवाब में फुफकारते हुए उसने कहा, 
`घर में है ही क्या देखने के लिए?'
`यानी, बाहर कोई देखनेलायक मिल गई है क्या?'
`कुछ ऐसा ही समझो!'
`मतलब?'
`देखो तारा, मैं बच्चा चाहता हूं।'
`मैं नहीं चाहती?'
`इसीलिए कह रहा हूं, देखो, पहले भी इस विषय पर अपनी बातचीत हो चुकी है। बेकार में वही बातें दोहराने का.....'
`कौन है वह?' उसे बीच में ही टोकते हुए मैंने पूछा। 
`तुम्हारे ननिहाल की तरफ की ही है। सोनबावडी की।' 
यानी सदाशिव के ननिहाल की। माई की गांववाली। मेरे माथे की नस तडकी। मैंने पूछा, ' आखिर क्या करना चाहते हैं आप?' 

'वही मैं बता रहा था...हमने गांव में शादी कर ली है। उसे यहां लाने के लिए तुम्हारी इजाजत.....' 
'मेरी इजाजत?' मैं चीकी। मेरे पूरे बदन में आग लग गई। 'शादी करने से पहले मेरी इजाजत ली ?  फिर अब ये तमाशा क्यों कर रहे हो?' 
'तमाशा कैसा? मैंने शादी की है उसके साथ!'

'वाह! क्या तीर मारा है! लेकिन यह सब ऐसे चोरी-छिपे क्यों किया? करने के बाद फिर यहां क्यों आए हो? जहां किया वहीं रहते। क्या तुम जानते नहीं कि ये घर मेरा है?' मैंने जो कहा वह सुन कर प्रभाकर कुढ गया। बोला, 'हां, हां, जरा मुंह संभाल कर बात करना।' मैंने कहा, 'क्यों? तुमने मुझे धोखा दिया, मेरी सौत लेकर आए इसलिए चुप रहूं? खुद गुनाह करके मुझ पर रौब गांठने में शर्म नहीं आती?'
प्रभाकर दौड कर मेरे पास आया। झटके से उसने मेरी कलाई पकडी और मरोडते हुए बोला, 'खबरदार अगर मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश की तुमने!'
चिल्लाकर मैंने पूछा, 'क्या कर लोगे?' प्रभाकर का हाथ उठा और एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद हुआ। वह बोला, 'बांझ होकर मुझसे जबान लडाती हो?'
मैंने होश गंवाए हों जैसे। मैं चिल्लाई, 'चले जाओ.....निकल जाओ यहां से....' मैं शायद बहुत जोर से चिल्लाई थी। क्योंकि किसीने हमारे घर की कुंडी बजाई। दरवाजा खोल कर देखा तो डरी हुई पडोसन पूछने लगी कि, क्या हुआ? उसे परे हटा कर मैं दरवाजे से ही चिल्लाई, 'निकलो, निकल जाओ कहा ना?'
खुला दरवाजा, उसमें से झांकते पडोसी और मेरा चंडिका का रूप देख कर प्रभाकर बौखला गया। बात ऐसा मोड लेगी उसने शायद सोचा नहीं था। 
दांत पीसते हुए उसने अपना ब्रीफकेस उठाया और मेरी तरफ देखते हुए आंखें तरेर कर कहा, 'देख लूंगा तुझे...' और वह झट-से बाहर निकल गया। मैं सोफे पर लुढक गई। सब पडोसनें पूछ रही थीं, 'क्या हुआ?, क्या हुआ?' लेकिन मैंने उनसे कहा, 'कुछ नहीं, आप लोग जाइए। मेरी आवाज इतनी अजीब थी कि खुद मुझे पराई लगी। 
पता नहीं कितनी देर तक मैं उसी तरह बैठी रही। अंधेरा घिर आया तो मुझे एक बात का डर लगने लगा। रात में लौट कर प्रभाकर ने दरवाजे पर तमाशा खडा किया तो मैं क्या कर सकती थी? मैं फिर उठी। थैली में दो साडियां ठूंसी। दरवाजे पर बडा सा ताला लगाया और सदाशिव की खोली की तरफ चल दी। 
सुनते ही सदाशिव भडक गया। 'उसकी ये मजाल!' कहते कहते दो-चार तगडी गालियां उसने प्रभाकर के नाम पर थूक दीं। फिर मुझसे पूछा, 'फिर अब करना क्या चाहती हो तुम?'

'उस पर मुकदमा ठोंकेंगे और क्या?' मैंने कहा। 
'और नहीं तो क्या?', सदा ने भी कडा रुख अपनाते हुए कहा, उसे अपने किए की सजा तो दिला कर रहेंगे। बाद में वह और उसकी बीबी मिल कर देर तक प्रभाकर को गालियां देते रहे। 
मैं रात भर सो नहीं पाई। प्रभाकर का हमेशा घर से गायब रहना, दूसरी शादी के बारे में बताना और झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर जडना सब एक एक कर याद आने लगा। बेइज्जती के बिच्छू का जहर पूरे शरीर भर में फैला। सुबह मैंने सदाशिव से कहा कि वह प्रभाकर की कंपनी में जाकर उससे मिले और पता करे कि लडकी कौन है? और कब उन दोनों ने शादी की? 
सदाशिव ने कहा, 'ठीक है। पता करते हैं कि उसने किया क्या है? और तुम, दफ्तर नहीं जाओगी आज?'
'नहीं, हरारत सी लग रही है। तुम वहां रुकना मत, शाम को जल्दी चले आना।' 
'जरा दस रुपये देना तो...', खिसियानी हंसी हंसते हुए सदाशिव ने कहा।  उसे दस के दो नोट थमाते हुए मैंने कहा,'कुछ पता करके ही आना। सुराग जरूर लाना।'

दोपहर ढलने के बाद सदाशिव लौटा। लेकिन लौटा हुआ सदाशिव कोई और ही था। "हो सकता है प्रभाकर की गलती हुई हो, लेकिन बच्चा पाने के लिए....." कहते हुए वह मुझे ही समझाने लगा। 
उसकी बातें अब मेरे लिए बेमतलब हो गई थीं। उसकी बातों से कुल इतना पता चला कि चार दिन पहले गांव में ही प्रभाकर की शादी हो चुकी है। और उसकी नई ब्याहता गांव में प्रभाकर के ही घर में रहती है। 
रातवाली थैली उठा कर मैं शाम की गाडी से गांव रवाना हुई। सदाशिव को साथ चलने के लिए कहा लेकिन उसने मना कर दिया। रात यात्रा में बीती। सुबह थके हुए तन मन से मैंने गांव में कदम रखा तो सबको अपनी तरफ ही ताकते हुए पाया। किसी के चेहरे पर मुझे पढने की कोशिश थी, तो कोई चेहरा प्रभाकर की पत्नी किसलिए आई होगी इस बात का अंदाजा लगा रहा था। 
आंगन में आई तो देखा कि ससुरजी बरामदे में बैठे चिलम पी रहे हैं। मुझे देखते ही वह सकपकाए। उन्होंने कहा, "आं, ताराबाई, अचानक कैसे आना हुआ?" मैंने थैली नीचे रखी। अभी बैठ ही रही थी कि अंदर के दरवाजे के पास कहीं चूडियां खनकीं। मैंने महसूस किया कि पल भर में झांक कर कोई दरवाजे के पीछे छिप गया। 
मैं कुछ कहती इससे पहले ससुरजी बोले, "ताराबाई, यात्रा से थक गई होगी। हाथ-मुंह धो लो, चाय पिएंगे, फिर बातचीत होती रहेगी।" "अब बचा क्या है बोलने के लिए?", मैंने कहा, इतना सब कुछ हुआ और आपने मुझे खबर तक नहीं की..."
"क्या कहा? बताया नहीं?" जली हुई तमाखू चिलम से नीचे झटकते हुए अचरज भरे स्वर में ससुर ने कहा। लेकिन प्रभाकर ने तो यही कहा कि इस शादी को लेकर तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है। 
मैं समझ नहीं पाई कि ससुरजी को क्या कहूं। गुस्से से सिर चकराने लगा। सीढियां उतर कर मैं एकदम अंदर गई.... अंदर चूल्हे के पास मेरी सौत घूंघट काढे बैठी थी। मुझे देख कर वह डर गई। बिल्ली की तरह मुझे देखने लगी। उसके हाथ की हरी चूडियों या उसकी माथे की बडी बिंदी से ज्यादा उसकी कमसिनी मेरे सीने में खंजर की तरह उतर गई। अचानक मैं चिल्लाई, "इसका अंजाम बहुत बुरा होगा, कहे देती हूं।" ससुरजी हडबडाकर अंदर आते हुए बोले, "धीरज से काम लो तारा बहू, धीरज से।" 
"कैसे धीरज धरूं? यह सब करके मेरी जिंदगी में आग लगाते हुए आप लोगों के मन में मेरा खयाल तक नहीं आया......।" मैं चीख चीख कर बोल रही थी। आवाज सुन कर गांव के लोग आंगन में इकठ्ठे हो गए। ससुरजी बाहर गए और उन पर बरसे, "यहां क्या तमाशा चल रहा है? चलो, निकलो यहां से।" लोग जाने के लिए मुडे तो मैं चिल्लाई, "रुको, मैं आपसे पूछती हूं, मैं इस घर की बहू हूं और मेरे होते हुए आप इस लडकी को कैसे बहू बना कर ले आए? क्यों ले आए?"
मेरी बात जैसे लोगों तक पहुंची ही नहीं। वे चुपचाप चलते रहे। चलते चले गए। अपनी थैली उठाते हुए उनके पीछे मैं भी चल पडी। ठीक है, मैं भी देख लूंगी....

"ताराबाई...ताराबाई...सुनो..." ससुर कहते रहे, लेकिन मैं रुकी नहीं। 
धूप अब तेज हो गई थी। बदन जलने लगा था। मन भी गुस्से से सुलग रहा था। जंगल रौंदते हुए मैं मायके की तरफ बढ रही थी। ठोकरों से पैर लहूलुहान हो गए थे। मायके पहुंची तो सब सुनसान था। दरवाजे भिडा कर सब लोग खलिहान गए हुए थे। घर में बस अम्मा थी। इन दिनों बाबा और वह बीमार चल रहे थे। अम्मा घर पर थी यानी दोनों में से कोई बीमार था यह बात पक्की थी।
मुझे आंगन में देख कर अम्मा बांह पसारे आगे आ गई। मुझसे लिपट कर रोने लगी। मैंने पूछा तो अम्मा बोली, "बेटी, देखो, तेरे बाबा बीमार हैं। तेरी खबर सुनते ही उन्होंने खाट पकड ली। हम लोगों को पहले कुछ पता ही नहीं था। उस दिन मेले में तुम्हारे पति से बातें हुईं लेकिन उन्होंने हमें कुछ बताया नहीं। फिर खबर आयी कि उसने तुम्हारी इजाजत से दूसरी शादी रचा ली है।" 

मैंने चुपचाप उनकी सारी बातें सुनीं। बाबा बिस्तर पर ही उठ कर बैठ गए। मैंने पूछा, "क्या तकलीफ है बाबा?", तो बोले, "अब क्या होना है? अब हम थक गए, झुक गए। अब यह सब चलता रहेगा। ...."
अम्मा ने पानी का लोटा सामने रख कर कहा, "जाओ, हाथ-मुंह धो लेना, कुल्ला कर लेना...मैं तब तक नहाने का पानी चढाती हूं।" 
मैंने मुंह धोकर चाय पी। थके शरीर को दीवार का सहारा देते हुए बैठ गई। फिर कहा, "बाबा, रात को चार समझदार लोगों को बुलाना। मैं कुछ फैसले करना चाहती हूं।" मैंने जो कहा वह सुन कर दोनों ने एकदूसरे की तरफ देखा। कुछ समय बाद अम्मा ने कहा, "बाई, अपना भाग्य ही खोटा हो तो किसको दोष दें। फिर हमारी तो है औरत जात।"
"अम्मा, क्या भाग्य सिर्फ औरत का ही होता है?"
"वो बात नहीं, लेकिन हम सौतें भी बहनों की तरह रही ना?"
"अम्मा, आपने जो किया वह शिक्षा हमें मत देना। वह समय ही था वैसा। लेकिन अब जमाना बदल गया है।" 
"ठीक है, लेकिन यह तो बताओ कि तुम करना क्या चाहती हो?"
"मैं तिकोना घर नहीं चाहती। मैं तलाक चाहती हूं।" मैंने बेझिझक कह दिया, "देखो, हमारा पक्ष लूला है। तुम्हारी शादी को आज दस साल हुए। अभी बच्चा पैदा नहीं हुआ।" 
"तो क्या अब आप लोग गॅारंटी दे सकते हैं कि बच्चा पैदा होगा?" मेरे सवाल का जवाब बाबा के पास नहीं था। वह चुप रहे। इतने में दो-तीन गांववाले और चाचा आए। उन्होंने जो कहा उसका सार यही था कि प्रभाकर ने शादी ही की है। किसी औरत को लाकर बिठा तो नहीं लिया। प्रभाकर की शादी के बारे में बात चली तो किसीने कहा कि उसने बंबई में ही शादी की और पत्नी को लाकर यहां रखा। किसीने कहा कि भिंगरोली के बौद्ध विहार में उसने शादी रचाई। 
वैसे तराली और भिंगरोली अगल-बगल के गांव हैं। यहां किसीने भौं टेढी की तो वहां पता चल जाता है। इसके बावजूद कोई खुलकर साफ साफ कुछ कह नहीं रहा था। 
मैंने कहा, "देखो, प्रभाकर ने शादी कर ली और अब उसकी बीबी उसके साथ ही रहती है। इन दो बातों पर गौर करके पंचायत बुला लो। इसका विरोध करो। प्रभाकर को सजा भी दिला दो। सबसे जरूरी है पंचायत का यह फैसला करना कि अब मेरा और उसका रिश्ता खत्म हो चुका है। और प्रभाकर को ताकीद दें कि अब वह मेरे घर में रह नहीं पाएगा। मेरी बात सुनकर चाचा ने कहा, "ये क्या बोल रही हो? औरतजात हो तुम। अकेले कैसे रहोगी।?" मैंने तैश में कहा, क्यों नहीं रह सकती। कितनी ही औरतें हैं जो अकेले रहती हैं। मैं भी वैसे ही रह लूंगी। लेकिन मैं उन दोनों को सबक सिखाऊंगी। लोग एक-दूसरे का मुंह देखते, नाक-कान खुजाते सुन भी रहे थे। 
उनकी उदासीनता और चुप्पी से जो संकेत मुझे मिल रहा था उसे मैंने स्पष्ट रूप से भांप लिया। असल में वह मेरा, मेरी पढाई-लिखाई का, नौकरी और वैवाहिक जीवन का, मेरी भावनाओं का, व्यवस्थितता का और मेरे वजूद का ही अपमान था। 
दोपहर में रोटियां खाकर तुरंत लौटने की मैंने सोची थी। मगर मां बोली, "बेटी, आते ही लौट मत जाना। रात भर तो ठहरो। रात में बातें करेंगे।" 
'बात करने को बचा ही क्या है?' मैंने तुनककर कहा। अभी मत जाओ, चेहरा कितना उतर गया है तुम्हारा। मां को सिर्फ मेरा चेहरा नजर आ रहा था। वह मेरे मन की थाह नहीं ले पा रही थी । रात को मुझे इसका पूरा अहसास हो गया। 
अंधेरा होते ही माई घर में आई। सारा शरीर कीचड  सना हुआ। बाल चेहरे पर बिखरे हुए। पसीने से तर। सिंदूर नाक तक फैल आया था। उसके हाथ में फावडा और कुदाल थी। और भी कुछ सामान था। आते ही मुझे उडती निगाहों से देख कर वह सीधे पिछवाडे चली गई। उसकी नजर और उसका यूं चले जाना मुझे अखरा। उसने मुझसे "कैसी हो, या कब आई?" तक नहीं पूछा। पूछती भी किस मुंह से। मेरी सौत उसकी गांववाली थी। इतना ही नहीं, रिश्ते में वह उसकी दूर की बहन थी। फिर मैंने भी उसे सुनाते हुए अम्मा से कहा, "हंसते-खेलते घर में आग लगाने की आदत ही है सोनबावडी की औरतों को पता नहीं और कितने घरों में आग लगाएंगी।" 
अम्मा ने एकदम से कहा, 'बेटी, इस शादी के बारे में उसे कुछ भी पता नहीं है। उसे कुछ मत कहो। मैंने कहा, क्यों न कहूं। अम्मा तुम चुप रही इसलिए तुम्हें यह वनवास झेलना पडा। अब यही सब मेरे हिस्से भी आ गया....." गुस्से में मैं बोलती चली गई। अम्मा उठ कर अंधेरे में बाहर कहीं चली गई। 
रात खाना खाते समय लालटेन की रोशनी में मै माई की तरफ देख रही थी। लेकिन न उसने मेरी तरफ देखा और न बात ही करने की कोशिश की। उसकी चुप्पी मुझे अम्मा-बाबा और गांववालों के शब्दों से ज्यादा गड रही थी।
अम्मा और मैं आंगन में लालटेन के इर्द-गिर्द चुपचाप बैठी थीं, अपने अपने जखमों की टीस सहती हुईं। इतने में पांच औरतें आईं। हमारे आसपास बैठ गईं। अम्मा ने कहा, "तारा पहचानती हो इन्हें?"
मैंने देखा, उनमें से दो-तीन के चेहरे पहचाने से लगे। पढाई और नौकरी की वजह से मैं सदा बाहर ही रहती आई थी सो गांव की सभी औरतों को मैं ठीक से जानती नहीं थी। उनके सिर पर ओढे पल्लू, माथे के सिंदूर, की जगह का गोदना और सभी चेहरों पर छिपाने की लाख कोशिशों के बावजूद फैली असहायता। 
अम्मा बोलती रही, "बेटा, ये सब हमारे जैसी ही हैं। इनको देखो। वह है धुर्पदा। चार लडकियां पैदा हुईं तो खुद पति का ब्याह रचा कर सौत घर ले आई। यह है चांगुना। इसका घरवाला मिलीट्री में गया और वहां से दो औरतें साथ लेकर आया। और इस सजनी को देखो।" अम्मा ने एक बहुत ही दुबली और बिखरे बालों वाली औरत की तरफ उंगली उठाई। अम्मा हंसने लगी। बाकी औरतें भी हंस रही थीं। सजनी भी हंस रही थी। 
मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वे सब किस बात पर हंस रही थीं। फिर अम्मा ने बताया, "अरे, यह तो पगली है। शादी हुई तब यह छोटी थी। लेकिन बडी होने के बाद भी इसने पति को पास फटकने नहीं दिया। वह पास आता तो यह चिल्लाती। भाग जाती जंगल में। सास से कहती कि पति के साथ घर में अकेले नहीं रहूंगी। आप भी मेरे साथ रहना।" फिर इसके पति ने दूसरी शादी की। अम्मा बता रही थीं और सब हंस रही थीं। मैंने सजनी की तरफ देखा, दर्द से उसका चेहरा निचुड गया था। अचानक उठकर वह चली गई। 
अम्मा ने कहा, "बेटी, इन सबने सौत को अपनाया, तू भी अपना।" अम्मा का बर्ताव मुझे बडा अटपटा लगा। गुस्सा आया। मैंने कहा, "अम्मा, यह सब तुम क्या कह रही हो? ये सब शरीर के घाव थोड़े ही हैं कि गिन कर, नाप कर देखें कि किसके घाव कितने गहरे हैं? कितने बड़े हैं? इस मामले में सांत्वना भी कैसे दी जा सकती है? मैं अब किसीसे भी कुछ भी सुनना नहीं चाहती," - कहते हुए मैं उठ कर अंदर चली आई तो देखा कि अंदर दरवाजे के पीछे खड़ी माई हमारी बातें सुन रही थी।
उसके बाद मैंने पक्का कर लिया कि अब चाहे जो हो, प्रभाकर पर मुकदमा ठोंकना ही है। रुपया खरचना पड़ेगा, छुट्टियां लेनी पड़ेंगी और सबके खिलाफ खड़े होना पड़ेगा। चलेगा। इससे कम से कम मेरे मायके वालों को और ससुराल वालों को सीख तो मिलेगी। 
"प्लीज योर ऑनर", शब्दों से मेरी तंद्रा टूटी। वकील कोर्ट के सामने केस रख रहे थे... ''फरियादी ताराबाई सोनावणे को प्रभाकर सोनावणे ने बहुत सताया है। ताराबाई के घर में प्रभाकर जबरन एक औरत के साथ घुस कर रहने लगा था। ताराबाई ने इसका विरोध किया तो उन्हें गंदी गालियां पडीं और उन्हें पीटा भी गया। ये गंभीर अपराध हैं।'' - वकील कोर्ट के सामने केस खड़ा कर रहे थे। 
उन्होंने कहा, "ताराबाई ने फलां तारीख को प्रभाकर और उसके साथ रहनेवाली महिला को घर से भगा दिया। इसीलिए चिढ कर आरोपी प्रभाकर ने ताराबाई के ऑफिस जाने के बाद उसके घर का ताला तोड़ा और उस महिला के साथ घर में प्रवेश किया। उस समय ताराबाई के पड़ोसी भी उपस्थित थे।" 
अपने जवाब में प्रभाकर ने साफ इनकार किया कि उसने ताराबाई के घर का ताला तोड़ा। ताला तोड़े समय साथ किसी महिला के होने की बात से भी साफ इनकार किया। उसने कहा, ''मैंने दूसरी शादी नहीं की। सो किसी औरत का मेरे साथ होने का सवाल ही नहीं उठता। फलां फलां तारीख को मैं गांव लौटा और रास्ते में एक परिचित व्यक्ति से मेरी भेंट हुई। उसी के साथ मैं घर लौटा। अपनी चाभी से दरवाजा खोल कर अंदर गया। बाद में ताराबाई ने वह चाभी मुझसे ले ली।'' 
'तुम्हारे साथ दूसरा व्यक्ति कौन था?' वकील ने पूछा। जवाब देते हुए प्रभाकर के चेहरे पर धूर्त हंसी  थी, मेरी तरफ देखते हुए उसने कहा, "मेरी इकलौती पत्नी का इकलौता भाई - सदाशिव कांबले मेरे साथ था।" मैंने चौंक कर सदाशिव की तरफ देखा तो वह मुझे 'शांत रहो', 'रुको' के इशारे कर रहा था। 
वकीलों ने फिर सदाशिव पर प्रश्नों की बौछार की पर किसीने सदाशिव पर जैसे मंत्र ही फेर दिया था। उसने अपनी जबान से प्रभाकर की शादी नहीं होने का सफेद झूठ परोसा। और कहा, ''इधर कुछ समय से मेरी बहन ताराबाई और बहनोई प्रभाकर के बीच झगडे चल रहे थे। बच्चा नहीं होना ही उन झगड़ों की जड़ थी यह सब लोग जानते हैं।'' 
फलां तारीख को मेरे बहनोई मुझे रास्ते में मिले। उन्होंने घर चलने के लिए कहा सो मैं उनके साथ घर चला गया। प्रभाकर ने चाभी से दरवाजा खोला। हम लोग अंदर दाखिल हुए। ताराबाई की गलतफहमी को कोर्ट दूर करे और दोनों को आपस में मिल जुल कर रहने की सलाह दे!" 
काफी लंबे बयान के बाद सदाशिव को शादी का सबूत पेश करने के लिए कहा गया। अगली तारीख तय करने के बाद कोर्ट बर्खास्त हुआ। वकील भुनभुनाते हुए ही बाहर निकले। उन्होंने कहा, ''तुम्हारा इकलौता गवाह, तुम्हारा भाई भी तुम्हारे खिलाफ क्यों गया?''
''साहब, मैं क्या कर सकती हूं? गांव से लौटने के बाद केस को लौटाने के लिए, फिर पति के साथ मैं रहूं इसके लिए वह मेरे पीछे पड़ा था।'' मैं कह रही थी- ''तो क्या बिना किसी पूर्वसूचना के उसे ऐसा करना चाहिए? चाहे तो झूठी गवाही देने के जुर्म में हम उसे सजा भी दिला सकते हैं।''           
''हां साहब, लेकिन बिना सबूत के मैं कुछ भी नहीं कर सकती हूं यह भी वह जानता है। इसके बावजूद मैं यह केस लडूंगी साहब...''
''किसके सहारे?''
''देखते हैं, कोई न कोई राह निकल ही आएगी।" मैंने कहा तो सही लेकिन खुद मुझे अपनी नाव डूबती महसूस हो रही थी।  
"ठीक है, फिर एक बार मैं आपके पड़ोसियों से मिल लेता हूं। देखते हैं मेरी बातों का क्या असर होता है... इसके बावजूद शादी का प्रमाणपत्र तो चाहिए ही।" मेरा वकील तक मेरे खिलाफ हो गया था। मैं निपट अकेली हो गई थी। 
दूसरे दिन दफ्तर गई तो सहेलियों ने कहा, "गांव जाओ, किसी पुरोहित को पकड़ो, रुपए देकर प्रमाणपत्र ले आओ। जब प्रभाकर झूठ बोल रहा है तो उसे सबक तो सिखाना ही पड़ेगा। सच पूछो, तो घर की चीजों के गुम होने की रपट भी तुम्हें लिखवानी चाहिए।'' 
सचमुच, ऐसा ही करें तो? - वैसे भी प्रभाकर मुझे सब तरफ से कंगाल बनाकर ही गया है। मेरा अपना भाई सदा भी उसके साथ हो गया है। मेरी सौत दूर के रिश्ते में उसकी मौसी जो लगती है! शायद इसीलिए वह प्रभाकर से जा मिला। इस बहाने भाई से भी बदला लिया जा सकता है। तीन-चार दिनों तक यही विचार मेरे मन में कौंधते रहे। मैं कोई निर्णय नहीं ले पाई। उस दिन वकील आनेवाले थे सो कुछ बातें उन्हें भी बताई जाएं फिर निर्णय लिया जा सकता है।
उस दिन मैं ऑफिस से जल्द ही घर पहुंची। वकील के आने की बात पड़ोसन को बताई और ताला खोल कर तुरंत घर में घुस गई। प्रभाकर का डर भी था, न जाने कब आ धमके। 
कपड़े बदल कर चाय रखी तो बेल बजी। मुझे लगा वकील होगा। कीहोल से झांक कर देखा तो दंग रह गई। बाहर माई खड़ी थी। मैं डर गई। ये क्यों आई होगी? डरते डरते, बड़ी सावधानी से दरवाजा खोला। वह अकेली ही आई थी। उससे कुछ बोलने की इच्छा ही नहीं हुई। उसने भी कुछ नहीं कहा। अंदर आकर जमीन पर ही बैठ गई। पानी का गिलास उसके सामने रखते हुए फिर मैंने ही बात छेड़ी, 
"कब आयी?"
"सुबह।,"
"यहां कौन ले आया?"
"सदा।"
"बाबा, अम्मा कैसे हैं?"
"ठीक हैं।"
वह नाप-तौल कर ही बोल रही थी। लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे अंदर से लग रहा था कि वह बहुत कुछ बोलने आई है। वह क्या बोलना चाहती थी, यह भी मैं जानती थी। सदा ने मेरे खिलाफ झूठी गवाही दी थी। उसे मैं अंदर करवा सकती थी। मेरी सौत माई की बहन लगती थी। शायद वह यही कहने आई थी कि मेरी बहन और अपने भाई को माफ कर दो। 
उसके सामने चाय रख कर मैंने पूछा, "क्यों आयी हो?"
चाय की भाप की तरफ देखते हुए माई ने कहा, "तारा, मुझे लगा कि मैं तुमसे मिलूं। तुमसे बात करूं।" एक घर तो तोड़ चुकी थी अब दूसरा घर तोड़ने चली थी वह! एक बार लगा कि बिना कुछ भी कहे-सुने उसका हाथ पकड़ कर घसीट कर उसे घर से बाहर कर दूं। लेकिन मैं कप के ऊपर से बस उसे देखती रह गई। उसने आगे कहा, "मैं जानती हूं कि तुम मुझसे नाराज हो, बिल्कुल बचपन से ही नाराज हो। क्योंकि, मैं घर में आई इसलिए तुम्हारी अम्मा पर अन्याय हुआ ऐसा तुम्हें लगता था। लेकिन कभी मेरे साथ हुए अन्याय के बारे में सोचा है? तुम जब दस साल की थी तब मैं सत्रह साल की थी। मुझे मां बुलाते समय तुम्हें दुख होता, तुम्हें बेटी कहते समय मुझे भी बुरा लगता। लेकिन ये बातें आखिर बताएं तो किसे?"
"तुम्हारी मां ने मुझे अपनाया इसलिए उन्हें बड़प्पन मिला, लेकिन मैंने सबको अपनाया तो मुझे क्या मिला? दो बीबियों का पति होना पुरुष के लिए आनंद की बात होगी लेकिन इससे औरत के जीवन का क्या हश्र होता है इसके बारे में कभी किसीने नहीं सोचा।" माई के मुंह से ये फलसफेनुमा बातें सुन कर मैं दंग रह गई। चाय की चुस्की लेते हुए माई इस तरह बोल रही थी मानो बीती हुई ज़िंदगी की कड़वी यादों के घूंट पी रही हों। 
"तारा, तुम पढ़ी लिखी हो, नौकरी करती हो, तुम्हारे हाथ में सत्ता है, सो तुम पति को कोर्ट में खींच सकती हो। मैंने और तुम्हारी अम्मा ने क्या किया? मैं बाप की उम्र के आदमी की बीबी बनी, उस वक्त मुझ पर क्या बीती होगी? क्या कभी तुमने इस बारे में सोचा है? नहीं, तुम्हें इस बात का खयाल ही नहीं है। तुमने कहा था कि सोनबावडी की औरतें हंसते-खेलते घरों में आग लगाती हैं। लेकिन तारा, औरतें आग नहीं लगाती हैं, आग लगाते हैं आदमी। अपनी बच्चियों को किसीके भी हाथों बेच देते हैं। किसीकी नन्ही बच्ची को भी ब्याह लाते हैं। यह सब बंद होना चाहिए। तारा, जो तुम आज कर रही हो वह मैं भी करना चाहती थी। शौकिया दो-दो शादियां करनेवालों को सबक सिखाना चाहती थी। कुछ करना चाहिए ऐसा मुझे भी लगता था। लेकिन मैं ठहरी अनपढ़-गंवार। मेरे पास न शिक्षा थी न सत्ता। लेकिन तुम कर सकती हो, इसलिए मुझे तुम पर नाज़ है।" 
"मैं जानती हूं कि कोई भी तेरी तरफ से बोलनेवाला नहीं है क्योंकि, पढने-लिखने के बावजूद तुम एक औरत ही हो। इसलिए, तुम्हारे भाई ने, सदाशिव ने भी झूठी गवाही दी। लेकिन तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हारे  साथ हूं। जंवाईबापू ने दूसरी शादी की इसका सबूत तुम्हें चाहिए था ना? मैं लाई हूं।" माई ने अपनी थैली में से कागज निकाला और मेरे हाथ में रख दिया। कहा, "जिस पुरोहित ने तुम्हारे पति की शादी रचाई उससे मैं लिखा कर लाई हूं यह कागज। ये लो और अब अपने भाई का और पति का जो करना है सो करो।" 
"तारा, ऐसे क्या देख रही हो? तुम्हारा पति शादी रचा कर इनकार कर रहा है। उसने तुम्हारे बारे में नहीं सोचा। यह तो चलो ठीक है। लेकिन जिसके साथ उसने शादी की उसके बारे में भी सोचा है?उसके साथ शादी की बात को अगर वह आज झूठ करार दे रहा है तो फिर किस रिश्ते से वह उसे अपने साथ रख रहा है? अपनी रखैल बना कर?"
माई का सवाल सुन कर, उनका लाया सबूत देख कर मैं दंग रह गई। दरवाजे की बेल बजी, बाहर वकील खड़े थे और मैं अचंभित सी माई की तरफ बस देखती रह गई। 
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