Sunday, November 27, 2011

शब्दचित्र - 2. औचाबेन*



बेल बजी तो ललिता ने कम्मो से कहा, 'देखो जरा, पापा तो नहीं आए?'
कम्मो ने दरवाजा खोला और वह भौंचक सी, सहमी सी परे हटी। ललिता को लांघ कर अंदर चली गई।
'कौन है रे?' ललिता का सवाल उसके कान तक पहुंचा ही नहीं। दो कदम आगे बढ़ कर ललिता ने बाहर नज़र दौडायी। अचानक उसकी नज़र जम गई। बदन में झुरझुरी सी होने लगी। बाहर राजेश खड़ा था, ललिता का पति। और उसके साथ एक औरत थी। राजेश ने उस औरत के गले में बांह डाल कर रखी थी। देखते ही पता चल रहा था कि वह पूरी तरह टुन्न है। सदमा इतना भयंकर और दर्दनाक था कि ललिता बुत बन कर खड़ी कि खड़ी रह गई। राजेश ने झूलते हुए दहलीज के अंदर कदम रखा और उसका संतुलन बिगड गया। लड़खड़ाते राजेश को देख कर ललिता जान गई कि इस पियक्कड ने आज नशे में सारी हदें पार कर दी हैं। चार बच्चियों का यह बाप बेशर्म और बेमुरव्वत बन कर पता नहीं किस रंडी को घर ले आया है।
अंदर की तरफ जाते हुए राजेश ने ललिता को धक्का दिया तो ललिता ने लड़खडाकर गिरते गिरते सोफे का सहारा लिया। कम्मो- ललिता की बड़ी बेटी ने आगे बढ़ कर ललिता को सहारा दिया। न ललिता कुछ बोल पा रही थी और न कम्मो।
'अरे इसे उठा ले जा, उठा ले जा इस कचरे को.....' बेडरूम से आवाज आई और ललिता लपक कर बेडरूम के दरवाजे तक पहुंची। बिजली की तरह मन में खयाल कौंधा, ये कहीं हमारे बिस्तर पर....। ललिता को संभलने में देर हुई थी। राजेश और वह औरत बिस्तर पर पसर गए थे। राजेश ने बच्ची की लगभग गठरी बना कर बिस्तर से बाहर कर हाथ में लटका कर पकड़ रखा था। अपने आप पर उसका वश नहीं था। बच्ची अगर... मन में विचार आने से पहले शरीर में हरकत हुई और उसके हाथ से ललिता ने बच्ची की गठरी ले ली। राजेश ने हिकारत से कहा, 'लड़कियां ही लड़कियां.. एक के बाद एक लड़कियां....थूः!'
ललिता इस पर कोई प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं थी। ऐसी ढेरों फब्तियां वह आए दिन पचाती रहती थी। हर रोज... सास से, पति से, देवरानी से... जेठानी-ननद से, पडोसियों से....पूरे समाज से.....
एक ही बेडरूम का तो घर था। बाहरवाले कमरे में बिछे काऊच पर ललिता बैठी रही। गोद में बैठी बच्ची कुनमुनायी तो ललिता जागी। उसे बाथरूम ले गई। लौट कर उसे कोच पर सुलाया। चद्दर उढाई। सब आदत से। इतने में किसीके जोर से रोने की आवाज आई। ललिता चौंकी। कम्मो अपने बिस्तर पर उठ बैठी। दोनों आतंकित थीं। अंदर गुड्डी और छुटकी थीं। बेडरूम में। दिमाग में हालात जैसे ही साफ हुए ललिता लपकी। पीछे आ रही कम्मो को वहीं रोक कर ललिता ने बेडरूम के दरवाजे को पीटना शुरू किया। उस औरत ने आकर दरवाजा खोला। तीर की तरह ललिता अंदर घुसी। गुड्डी अपने बिस्तर पर लेटी थी और रो रही थी। ललिता को देखते ही वह अपने बिस्तर से नीचे कूदी और ‘मम्मी’ कह कर मुझसे लिपट गई। उसका रोना लगातार जारी था। इतने में राजेश जाग गया। हिकारत भरी आवाज में फुफकारते हुए बोला, 'ले जा, बाहर अपनी लौंडिया को। खाली-पिली कटकट..।'
गुड्डी और छुटकी को लेकर ललिता फिर ड्रॉइंग रूम में लौटी। बच्ची  के साथ छुटकी को काऊच पर सुलाया। गुड्डी कम्मो के साथ उसके बिस्तर में सिमट कर सो गई। ललिता वहीं कुर्सी से सिर टिका कर बैठी। सारी संज्ञाएं चेतनाशून्य थीं, दिमाग एकदम खाली था।
कुछ देर बाद बेडरूम का दरवाजा खोल कर वह औरत बाहर निकली। उसने आप ही गुसलखाना ढूंढा। बाहर आई तो लगा उसने हाथ-मुंह धो लिए थे। ललिता के सामने आकर वह खड़ी हो गई। नज़रें उसी पर टिकी होने के बावजूद ललिता उसे देख नहीं पा रही थी। अजीब हालत थी ललिता की, जैसे खुद को ही कोस रही थी। जो कुछ हो रहा था उसके लिए ललिताने अपने आप को ही गुनहगार करार दिया था शायद।
'कुछ खाने को मिलेगा?' उस औरत ने पूछा।
ललिता अचकचाई! उसे भूख लगी थी!
चुपचाप उठ कर ललिता रसोई में गई। दो रोटियां, दाल, साग थाली में परोस कर उसे दिया। ललिता के पीछे पीछे चल कर वह भी रसोई में पहुंची थी। दीवार से पीठ टिका कर वह जमीन पर ही पालथी मार कर बैठी और शांत भाव से खाना खाने लगी। ललिता अपनी ही रसोई में पराई होकर खड़ी रही। खाना खाकर उसने पानी पिया फिर ललिता की ओर देखते हुए वह बोली,
'हर रोज क्या ऐसाईच.....?'
कठपुतली की तरह ललिता की गर्दन ना में हिली। 
उसने पूछा, 'तो क्या आज पहली बार...?'
ललिता की गर्दन 'हां' में हिली। 
उसके मुंह से भद्दी गाली निकली। वह कुछ देर तक चुप रही। फिर गला खंकार कर बोली, 'देख तू औरत है....अच्छी औरत है इसलिए बोलती है। तेरी चार चार बेटियां हैं। ये मर्द का जात बडा हरामी होताए। उसको बेटी नई मंगता, उसको खाली औरत मंगता.....'
-संध्या पेडणेकर
*औरत चाहिए, बेटी नहीं
picture - peperonity.com

Sunday, November 20, 2011

शब्द चित्र - 1.मल्लिगे

दो रुपयों का कढ़ीपत्ता देने के लिए वह भी तैयार नहीं थी। 'पंज रुपए का लेना पडेगा,' दक्षिण भारतीय लहजे में वह बोली। चेहरे पर कोई भाव नहीं। हाथ मोगरे के फूलों की माला पिरोने में व्यस्त। मैंने कहा, 'ठीक है, दे दो!'
उसने माला का धागा जतन से नीचे रखा। प्लास्टिक की थैली निकाल कर उसमें ढेर सारा कढ़ीपत्ता डाला। मैंने दस का नोट दिया। वह खुला पैसा ढूंढने लगी। मैंने पूछा, 'मल्लिगे नहीं है?'
इतनी देर में पहली बार उसने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा। कहा, 'मल्लिगे जानेवारी में आएगा।'  खुला पैसा मेरे हाथ में थमाया और फिर माला का धागा हाथ में लेकर फूल पिरोने लगी।
पांच-छह साल पहले ठीक ऐसा ही हुआ था। यहीं। फर्क सिर्फ यह था कि उसकी जगह एक आदमी था। काला, मोटा,  खिचडी बालों वाला, गरीब, आम दक्षिण भारतीय आदमी जिससे सालों तक मिलते रहने के बावजूद आप कभी उसकी कोई खासियत न बता पाएं ऐसा।
बाजार की भीड भरी सड़क पर एक दक्षिण भारतीय राशन की दुकान के आगे वह अपना कढ़ीपत्ते, पान, पूजा का सामान और मोगरे के फूलों वाला ठेला लगाता था। ठेले के साथ वह इस अदा से खड़ा रहता था मानो वह ठेलेवाला नहीं बल्कि पीछेवाली दूकान का मालिक हो। 'मल्लिगे' के जिक्र पर उसके चेहरे पर भी मुस्कान खिली थी। उसने पूछा था, 'आप कनडा हैं?' मैंने हामी भरी तो उसने बड़े उत्साह के साथ बताया था 'मेरी बेटी का नाम भी मल्लिगे है... हम उसे मल्ली करके बुलाते हैं। अभी उसका शादी हो गया। उधर, बंगलुरु में रहती है वह।'
बाजारवाले दिन मैं उससे कढीपत्ता जरूर खरीदती और वह भी मुस्कुराकर हालचाल पूछता। फूल खरीदने का अनुरोध करता।
और एक बार बाजारवाले दिन वह नहीं दिखा। उसके पड़ोस में केले का ठेला लगानेवाले भय्या से मैंने उसके बारे में पूछताछ की। उसने कहा, 'वह मर गया!'
सोचने-विचारनेवालों के लिए मौत भले भावनाओं से जुड़ा मामला हो, जो लोग मेहनत मजदूरी करके ज़िंदगी जीते हैं उनके लिए मौत केवल एक घटना भर होती है, अनिवार्य और सामान्य। केले वाले के सपाट  जवाब से एक बार फिर यह बात शिद्दत से महसूस हुई। उसके हाव-भाव में कढ़ीपत्तेवाले के लिए कोई निरादर नहीं था पर शब्द इतने सूखे थे कि बात गीले मांस में चुभाए नश्तर-सी सीने में उतर गई।
मैंने पूछा, 'कैसे?'
वह बोला, 'पीता था बोत। उस दिन और ज्यादा पी गया। रात उसे अस्पताल ले गए थे पर उन्होंने कहा, कि यह तो पहले ही मरा था। चीर-फाड़ कर लाश दी उन्होंने।'
दिन बीतते रहे।
जब भी बाजार जाती दुकान के आगेवाली खाली जगह उसकी याद दिलाती। क्यों पीते हैं लोग? -सवाल मन में उभरता। एकाध बार उसके परिवारवालों के बारे में खयाल आया।
फिर एक बाजारवाले ही दिन उसी जगह कढीपत्ते का ठेला नजर आया। साथ में एक महिला थी। सामान्य सी कद-काठी, सांवला रंग,नजर शून्य में कहीं टिकी हुई और हाथ मशीनी ढ़ंग से माला गूंथ रहे थे। अचानक मुझे अहसास हुआ, ये उस आदमी की बीवी होगी। केले बेचनेवाले ने मेरे खयाल की पुष्टि की।
कितनी समानता थी दोनों में!
मैंने कहीं पढ़ा था कि कुछ वर्ष साथ बिताने के बाद पति-पत्नी दोनों की शकल एक-सी हो जाती है। यानी अलग अलग देखने के बावजूद आप उन दोनों के बीच का रिश्ता पढ़ लेते हैं।
लगा, कितने साल दोनों ने साथ बिताए होंगे। सुख-दुख, संकट-आराम में एक-दूसरे का साथ दिया होगा। गुस्सा, प्रेम, नफरत, अपनापन, मार-पीट, सुखदायी स्पर्श,रोना-हंसना और भी न जाने क्या क्या साथ झेला होगा। लेकिन ये सब बातें उनके लिए मायने नहीं रखती थीं। उनके लिए मायने रखती थी सिर्फ 'मल्लिगे'। जिसकी माला बना कर बेच कर वे पेट पालते थे वह मल्लिगे नहीं, शादी करके जो ससुराल जा बसी थी वह 'मल्ली'। मोगरे के उस फूल ने उन दोनों के जीवन को सुगंधी कर दिया था। उसके नाम से दोनों के हृदय के तार झंकारते और होठों पर मुस्कुराहट खेलने लगती।
आंगन में जब तक मोगरे का पौधा न पनपे तब तक उसकी मन को बांध लेनेवाली खुशबू का अहसास पाना असंभव है। उनके जीवन में व्याप्त मोगरे की महक उस रोज औचक मेरे भी मन में उतर आयी।
-संध्या पेडणेकर

Wednesday, July 13, 2011

जीना

'मैं सोचती रही। इस कहानी का तो मानो  न कोई ओर था न छोर। मैं खीज उठी।                    लगा, क्यों मैं इस इत्ती सी बात को लेकर इसकदर व्याकुल हो रही हूं?'

उस दिन  किरण से मिले अपने आनंद में झूमती मैं चली आ रही थी। मेरी कहानी की उसने बहुत प्रशंसा की थी। मैं अपने चारों ओर अब कहानी ही महसूस कर रही थी। प्रकृति के हर जर्रे में मुझे कहानी के बीज दिखाई दे रहे थे। और मैं हर चीज को अपनी कहानी ाक बीज बनाती चली थी। उसकी प्रशंसा से ज्यादा उसकी आंखों में झलकती प्रेम की छाया ने मुझे मादक बना दिया था। चारों ओर की कहानी मस्तिष्क में घूम रही थी। अनजाने ही एक छोटी सी गृहस्थी का धुंधला मोहक चित्र दिल में समाता जा रहा था। मैं लगभग हवा में उड़ रही थी।

किसी जानवर के रिरियाने की सी आवाज सुन कर मैं चौंकी। देखा, थोडी दूर एक कुत्ता घिसटता हुआ सा आ रहा था। खुजली का मारा मरियल कुत्ता होता या कोई मां से बिछड़ा पिल्ला होता तो शायद मैं फिर अपने स्वप्नलोक में लौटती। इस हद तक के दुख की अब तक मैं आदि हो चुकी थी। पर मैंने देखा, उस कुत्ते को जो अपने पिछले दोनों पैर घसीटता हुआ चला आ रहा था। उसका रंग गंदी मिट्टी जैसा था और उन लूले पैरों पर वह और ज्यादा गहरा हो गया था। पीछे के दोनों पैरों के बीच उसकी पूंछ फंसी सी घिसटती चली जा रही थी। अचानक मेरा ध्यान गया, पीछे से बस आ रही थी। मुझे एकदम डर लगा कि कहीं वह बस के नीचे न आ जाए। पर नहीं, वह बस के नीचे नहीं आया।

मैंने उउस पर से नजरें हटा लीं। नाक की सीध में देखते हुए मैं आगे बढ़ी। मुझए लगा कि कुत्ता जान बूझ कर सडक से शरीर घसीट रहा है। शायद खुजली हो। कुत्तों की गंदगी पर मुझए एकदम घिन आई। मैं सामने देखती चली। पर जब कुत्ते के ठीक सामने आई तो आंखओं की कोरों से देखा। कुत्ता वहीं था, लेकिन अब उसे देख कर मेरा दिल ऐंठ सा गया। सारी कोमल भावनाएं जल गईं। एकदम दयनीय स्वर में रिरियाता-चीखता हुआ वह अपने पीछे के पैरों को घसीटता चला आ रहा था। उस कुत्ते के पीछे के दोनों पैर लूले थें और उसकी चाल से लग रहा था कि वह जन्म से ही लूला है।

उस सत्य को स्वीकार करने का साहस मुझमें नहीं था। झट आंखें फेर मैं चलती बनी। पर एक क्षण का वह अनुभव! होस्टल लौट कर मैंने अपने सारे काम पूरे किए। रोज की अपेक्षा सहेलियों के साथ थोडा ज्यादा हंसी-मजाक किया। सबने कहा भी कि, आज मैं जयादा खुश नजर आ रही हूं। हर समय मैं दिल को समझाती रही कि  मैं उस दृश्य को भूल गई हूं। पर जब रात में सोते वक्त किरण का सुंदर चेहरा मेरी आंखों के सामने आने के बजाय वह कुत्ता मेरी आंखओं के आगे आया तो मैं झुंझला उठी। मैं क्यों नहीं वह गंदा कुत्ता भुला पा रही?  न जाने किसने उसे यहां लाकर छोड़ दिया! कुत्ते को यहां लाकर छोड़नेवाले को मैं कोसने लगी। तभी मेरे दिमाग में एक विचार आया। क्यों न मैं उस कुत्ते पर कहानी लिखूं? दूसरे दिन उस कुत्ते को फिर से देखने का  निशअचय किया और मैं सोने की कोशिश करने लगी।

उसके बाद तीन-चार दिन बहुत व्यस्तता में बीते। किरण भी कहीं बाहर चला गया था शायद। पर एक दिन ुससे मेरी मुलाकात हुई। काफी देर तक हमने बातें कीं। मैं खुशी खुशी होस्टल की तरफ आ रही थी कि अचानक मैंने उस कुत्ते को वहां फिर देखा। इस बार भी उसे देख कर मैं चौंकी। पर उस रात का निश्चय याद आने के कारण मेरी जिज्ञासा जागृत हुई। काफई दूर खड़े होकर मैं उस कुत्ते के हावभाव देखने लगी। कुत्ता बेहद गंदा था। और शायद भूखा भी था। मुझए लगा कि इसके चीखने का तो अंत ही नहीं है। वह लगातार करुण स्वर में चीख रहा  था। मैंने उसका सारा शरीर देखा लेकिन उसकी आंखों से डर गई।विलक्षण कातर दयनीयता उनमें झलक रही थी। कोई मेरा दिल मुठ्ठी में भींच रहा हो जैसा लगा तो मैं झट चल पड़ी।

थोडी दूर जाने के बाद पीछे से किसी कुत्ते की क्रोध भरी गुर्राहट सुनाई दी। मैंने पीछे मुड़ कर देखा और तभी एक तगडा, पाला-पासा अल्सेशियन कुत्ता उस लूले कुत्ते प रटूट पड़ा। तगडे कुत्ते की भयानक गूंज में लूले कुत्ते का करुण चीत्कार सुनाई नहीं दे रहा था। पर उसकी छटपटाहट ने सबको स्तंभित कर दिया था। पत्थर फेंक कर लोगों ने दोनों कुत्तों को अलग किया। लूला कुत्ता चीत्कारता हुआ बेहद गंदे ढंग से शरीर को घसीटता हुआ वहां से दूर जाने का प्रयास करने लगा। अल्सेशियन कुत्ते के मालिक ने एक बार फिर उसका पट्टा थाम लिया था और वह अब भिन्ना रहा था कि म्युनिसीपालिटी वाले ऐसे गंदे कुत्तों को मरवा क्यों नहीं देते? भले चंगे कुत्तों को रोग लगा देंगे ये तो!

उस दिन होस्टल आने के बाद किसी काम में मेरा दिल नहीं लगा। किंकर्तव्यविमूढ सी मैं बैठी रही। एक अजीब तरह की कसमसाहट थी। मुझे लगा कि मैं कुछ नहीं कर सकती। न कर पाऊंगी कभी। मेरी जिंदगी भी उस कुत्ते के समान है जो चार पांवों के होते हुए भी दो पैरों पर चलने के लिए मजबूर है। मेरी ही क्यों, आस पास के सभी लोगों की। वे भई अपनी घिसटती ज़िंदगी का बोझ उठाए हुए एक अज्ञात छोर की ओर चले जा रहे हैं। अपने ही जीवन का बोझ ढ़ोते ढ़ोते अपनी आकांक्षाओं की, सपनों की अकाल मृत्यु के अहसास को दूसरों के सामने गिडगिडा कर भुलाने का प्रयास कर रहे हैं। भूख थी, लेकिन उस दिन मैं खाना भी नहीं खा सकी। सोचती रही। अगर इस विषय पर कहानी लिखनी हो तो उसे कहां से शुरू किया जाए?

मैं सोचती रही, सोचती रही। इस कहानी का ओर-छओर कुछ भी तो नहीं समझ में नहीं आ रहा था। मैं खीज उठी। लगा, इतनी सी बात को लेकर मैं क्यों इसकदर व्याकुल हो रही हूं? इस सवाल का समाधान भी मुझे नहीं मिला। मेरा दिल बुझने लगा। फिर धीरे धीरे मेरे मन में अपनी कहानी के इस पात्र के बारे में घृणा भर आई। मुझे लगने लगा, मेरी सारी कहानियां बौनी हैं। उनमें बस कुछ गोलमाल बातें हैं। इस सत्य को सहने का साहस मुझमें नहीं था। अपना बौनापन मुझे कचोटने लगा।

न जाने कब आंख लग गई। दूसरे दिन उठी तब मैं पिछले दिन का यह सारा किस्सा भूल गई थी। जब होस्टल से बाहर निकली तब सामने ही वह कुत्ता मुझे दीखा। इस बार मुझे बस हल्की सी सिहरन हुई। मैंने सोचा, क्यों यह कुत्ता जीता है? म्युनिसिपाल्टीवाले इसे जहर क्यों नहीं देते? पर आज मैं फिर उसकी तरफ देख नहीं पा रही थी।

आज भी वह कुत्ता उसी जगह बैठा हुआ कभी कभार दिखाई पड़ता है। मैं उसके बारे में सोचती हूं लेकिन मेरे खयालों में अब वह तीव्रता नहीं है। पहले मुझे लगा था कि जीवन का यह घिनौना पहलु देख कर मैं खुद जहर खा लूं, थोड़े दिनों बाद लगा कि उस कुत्ते को जहर देकर मार दूं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ज़िंदगी चलती रही।
-संध्या, एम ए प्रथम वर्ष, हिंदी विभाग।
पूर्व प्रकाशितः 'दिल्ली' अप्रैल 1982