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Sunday, November 20, 2011

शब्द चित्र - 1.मल्लिगे

दो रुपयों का कढ़ीपत्ता देने के लिए वह भी तैयार नहीं थी। 'पंज रुपए का लेना पडेगा,' दक्षिण भारतीय लहजे में वह बोली। चेहरे पर कोई भाव नहीं। हाथ मोगरे के फूलों की माला पिरोने में व्यस्त। मैंने कहा, 'ठीक है, दे दो!'
उसने माला का धागा जतन से नीचे रखा। प्लास्टिक की थैली निकाल कर उसमें ढेर सारा कढ़ीपत्ता डाला। मैंने दस का नोट दिया। वह खुला पैसा ढूंढने लगी। मैंने पूछा, 'मल्लिगे नहीं है?'
इतनी देर में पहली बार उसने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा। कहा, 'मल्लिगे जानेवारी में आएगा।'  खुला पैसा मेरे हाथ में थमाया और फिर माला का धागा हाथ में लेकर फूल पिरोने लगी।
पांच-छह साल पहले ठीक ऐसा ही हुआ था। यहीं। फर्क सिर्फ यह था कि उसकी जगह एक आदमी था। काला, मोटा,  खिचडी बालों वाला, गरीब, आम दक्षिण भारतीय आदमी जिससे सालों तक मिलते रहने के बावजूद आप कभी उसकी कोई खासियत न बता पाएं ऐसा।
बाजार की भीड भरी सड़क पर एक दक्षिण भारतीय राशन की दुकान के आगे वह अपना कढ़ीपत्ते, पान, पूजा का सामान और मोगरे के फूलों वाला ठेला लगाता था। ठेले के साथ वह इस अदा से खड़ा रहता था मानो वह ठेलेवाला नहीं बल्कि पीछेवाली दूकान का मालिक हो। 'मल्लिगे' के जिक्र पर उसके चेहरे पर भी मुस्कान खिली थी। उसने पूछा था, 'आप कनडा हैं?' मैंने हामी भरी तो उसने बड़े उत्साह के साथ बताया था 'मेरी बेटी का नाम भी मल्लिगे है... हम उसे मल्ली करके बुलाते हैं। अभी उसका शादी हो गया। उधर, बंगलुरु में रहती है वह।'
बाजारवाले दिन मैं उससे कढीपत्ता जरूर खरीदती और वह भी मुस्कुराकर हालचाल पूछता। फूल खरीदने का अनुरोध करता।
और एक बार बाजारवाले दिन वह नहीं दिखा। उसके पड़ोस में केले का ठेला लगानेवाले भय्या से मैंने उसके बारे में पूछताछ की। उसने कहा, 'वह मर गया!'
सोचने-विचारनेवालों के लिए मौत भले भावनाओं से जुड़ा मामला हो, जो लोग मेहनत मजदूरी करके ज़िंदगी जीते हैं उनके लिए मौत केवल एक घटना भर होती है, अनिवार्य और सामान्य। केले वाले के सपाट  जवाब से एक बार फिर यह बात शिद्दत से महसूस हुई। उसके हाव-भाव में कढ़ीपत्तेवाले के लिए कोई निरादर नहीं था पर शब्द इतने सूखे थे कि बात गीले मांस में चुभाए नश्तर-सी सीने में उतर गई।
मैंने पूछा, 'कैसे?'
वह बोला, 'पीता था बोत। उस दिन और ज्यादा पी गया। रात उसे अस्पताल ले गए थे पर उन्होंने कहा, कि यह तो पहले ही मरा था। चीर-फाड़ कर लाश दी उन्होंने।'
दिन बीतते रहे।
जब भी बाजार जाती दुकान के आगेवाली खाली जगह उसकी याद दिलाती। क्यों पीते हैं लोग? -सवाल मन में उभरता। एकाध बार उसके परिवारवालों के बारे में खयाल आया।
फिर एक बाजारवाले ही दिन उसी जगह कढीपत्ते का ठेला नजर आया। साथ में एक महिला थी। सामान्य सी कद-काठी, सांवला रंग,नजर शून्य में कहीं टिकी हुई और हाथ मशीनी ढ़ंग से माला गूंथ रहे थे। अचानक मुझे अहसास हुआ, ये उस आदमी की बीवी होगी। केले बेचनेवाले ने मेरे खयाल की पुष्टि की।
कितनी समानता थी दोनों में!
मैंने कहीं पढ़ा था कि कुछ वर्ष साथ बिताने के बाद पति-पत्नी दोनों की शकल एक-सी हो जाती है। यानी अलग अलग देखने के बावजूद आप उन दोनों के बीच का रिश्ता पढ़ लेते हैं।
लगा, कितने साल दोनों ने साथ बिताए होंगे। सुख-दुख, संकट-आराम में एक-दूसरे का साथ दिया होगा। गुस्सा, प्रेम, नफरत, अपनापन, मार-पीट, सुखदायी स्पर्श,रोना-हंसना और भी न जाने क्या क्या साथ झेला होगा। लेकिन ये सब बातें उनके लिए मायने नहीं रखती थीं। उनके लिए मायने रखती थी सिर्फ 'मल्लिगे'। जिसकी माला बना कर बेच कर वे पेट पालते थे वह मल्लिगे नहीं, शादी करके जो ससुराल जा बसी थी वह 'मल्ली'। मोगरे के उस फूल ने उन दोनों के जीवन को सुगंधी कर दिया था। उसके नाम से दोनों के हृदय के तार झंकारते और होठों पर मुस्कुराहट खेलने लगती।
आंगन में जब तक मोगरे का पौधा न पनपे तब तक उसकी मन को बांध लेनेवाली खुशबू का अहसास पाना असंभव है। उनके जीवन में व्याप्त मोगरे की महक उस रोज औचक मेरे भी मन में उतर आयी।
-संध्या पेडणेकर