'मैं सोचती रही। इस कहानी का तो मानो न कोई ओर था न छोर। मैं खीज उठी। लगा, क्यों मैं इस इत्ती सी बात को लेकर इसकदर व्याकुल हो रही हूं?'
किसी जानवर के रिरियाने की सी आवाज सुन कर मैं चौंकी। देखा, थोडी दूर एक कुत्ता घिसटता हुआ सा आ रहा था। खुजली का मारा मरियल कुत्ता होता या कोई मां से बिछड़ा पिल्ला होता तो शायद मैं फिर अपने स्वप्नलोक में लौटती। इस हद तक के दुख की अब तक मैं आदि हो चुकी थी। पर मैंने देखा, उस कुत्ते को जो अपने पिछले दोनों पैर घसीटता हुआ चला आ रहा था। उसका रंग गंदी मिट्टी जैसा था और उन लूले पैरों पर वह और ज्यादा गहरा हो गया था। पीछे के दोनों पैरों के बीच उसकी पूंछ फंसी सी घिसटती चली जा रही थी। अचानक मेरा ध्यान गया, पीछे से बस आ रही थी। मुझे एकदम डर लगा कि कहीं वह बस के नीचे न आ जाए। पर नहीं, वह बस के नीचे नहीं आया।
मैंने उउस पर से नजरें हटा लीं। नाक की सीध में देखते हुए मैं आगे बढ़ी। मुझए लगा कि कुत्ता जान बूझ कर सडक से शरीर घसीट रहा है। शायद खुजली हो। कुत्तों की गंदगी पर मुझए एकदम घिन आई। मैं सामने देखती चली। पर जब कुत्ते के ठीक सामने आई तो आंखओं की कोरों से देखा। कुत्ता वहीं था, लेकिन अब उसे देख कर मेरा दिल ऐंठ सा गया। सारी कोमल भावनाएं जल गईं। एकदम दयनीय स्वर में रिरियाता-चीखता हुआ वह अपने पीछे के पैरों को घसीटता चला आ रहा था। उस कुत्ते के पीछे के दोनों पैर लूले थें और उसकी चाल से लग रहा था कि वह जन्म से ही लूला है।
उस सत्य को स्वीकार करने का साहस मुझमें नहीं था। झट आंखें फेर मैं चलती बनी। पर एक क्षण का वह अनुभव! होस्टल लौट कर मैंने अपने सारे काम पूरे किए। रोज की अपेक्षा सहेलियों के साथ थोडा ज्यादा हंसी-मजाक किया। सबने कहा भी कि, आज मैं जयादा खुश नजर आ रही हूं। हर समय मैं दिल को समझाती रही कि मैं उस दृश्य को भूल गई हूं। पर जब रात में सोते वक्त किरण का सुंदर चेहरा मेरी आंखों के सामने आने के बजाय वह कुत्ता मेरी आंखओं के आगे आया तो मैं झुंझला उठी। मैं क्यों नहीं वह गंदा कुत्ता भुला पा रही? न जाने किसने उसे यहां लाकर छोड़ दिया! कुत्ते को यहां लाकर छोड़नेवाले को मैं कोसने लगी। तभी मेरे दिमाग में एक विचार आया। क्यों न मैं उस कुत्ते पर कहानी लिखूं? दूसरे दिन उस कुत्ते को फिर से देखने का निशअचय किया और मैं सोने की कोशिश करने लगी।
उसके बाद तीन-चार दिन बहुत व्यस्तता में बीते। किरण भी कहीं बाहर चला गया था शायद। पर एक दिन ुससे मेरी मुलाकात हुई। काफी देर तक हमने बातें कीं। मैं खुशी खुशी होस्टल की तरफ आ रही थी कि अचानक मैंने उस कुत्ते को वहां फिर देखा। इस बार भी उसे देख कर मैं चौंकी। पर उस रात का निश्चय याद आने के कारण मेरी जिज्ञासा जागृत हुई। काफई दूर खड़े होकर मैं उस कुत्ते के हावभाव देखने लगी। कुत्ता बेहद गंदा था। और शायद भूखा भी था। मुझए लगा कि इसके चीखने का तो अंत ही नहीं है। वह लगातार करुण स्वर में चीख रहा था। मैंने उसका सारा शरीर देखा लेकिन उसकी आंखों से डर गई।विलक्षण कातर दयनीयता उनमें झलक रही थी। कोई मेरा दिल मुठ्ठी में भींच रहा हो जैसा लगा तो मैं झट चल पड़ी।
थोडी दूर जाने के बाद पीछे से किसी कुत्ते की क्रोध भरी गुर्राहट सुनाई दी। मैंने पीछे मुड़ कर देखा और तभी एक तगडा, पाला-पासा अल्सेशियन कुत्ता उस लूले कुत्ते प रटूट पड़ा। तगडे कुत्ते की भयानक गूंज में लूले कुत्ते का करुण चीत्कार सुनाई नहीं दे रहा था। पर उसकी छटपटाहट ने सबको स्तंभित कर दिया था। पत्थर फेंक कर लोगों ने दोनों कुत्तों को अलग किया। लूला कुत्ता चीत्कारता हुआ बेहद गंदे ढंग से शरीर को घसीटता हुआ वहां से दूर जाने का प्रयास करने लगा। अल्सेशियन कुत्ते के मालिक ने एक बार फिर उसका पट्टा थाम लिया था और वह अब भिन्ना रहा था कि म्युनिसीपालिटी वाले ऐसे गंदे कुत्तों को मरवा क्यों नहीं देते? भले चंगे कुत्तों को रोग लगा देंगे ये तो!
उस दिन होस्टल आने के बाद किसी काम में मेरा दिल नहीं लगा। किंकर्तव्यविमूढ सी मैं बैठी रही। एक अजीब तरह की कसमसाहट थी। मुझे लगा कि मैं कुछ नहीं कर सकती। न कर पाऊंगी कभी। मेरी जिंदगी भी उस कुत्ते के समान है जो चार पांवों के होते हुए भी दो पैरों पर चलने के लिए मजबूर है। मेरी ही क्यों, आस पास के सभी लोगों की। वे भई अपनी घिसटती ज़िंदगी का बोझ उठाए हुए एक अज्ञात छोर की ओर चले जा रहे हैं। अपने ही जीवन का बोझ ढ़ोते ढ़ोते अपनी आकांक्षाओं की, सपनों की अकाल मृत्यु के अहसास को दूसरों के सामने गिडगिडा कर भुलाने का प्रयास कर रहे हैं। भूख थी, लेकिन उस दिन मैं खाना भी नहीं खा सकी। सोचती रही। अगर इस विषय पर कहानी लिखनी हो तो उसे कहां से शुरू किया जाए?
मैं सोचती रही, सोचती रही। इस कहानी का ओर-छओर कुछ भी तो नहीं समझ में नहीं आ रहा था। मैं खीज उठी। लगा, इतनी सी बात को लेकर मैं क्यों इसकदर व्याकुल हो रही हूं? इस सवाल का समाधान भी मुझे नहीं मिला। मेरा दिल बुझने लगा। फिर धीरे धीरे मेरे मन में अपनी कहानी के इस पात्र के बारे में घृणा भर आई। मुझे लगने लगा, मेरी सारी कहानियां बौनी हैं। उनमें बस कुछ गोलमाल बातें हैं। इस सत्य को सहने का साहस मुझमें नहीं था। अपना बौनापन मुझे कचोटने लगा।
न जाने कब आंख लग गई। दूसरे दिन उठी तब मैं पिछले दिन का यह सारा किस्सा भूल गई थी। जब होस्टल से बाहर निकली तब सामने ही वह कुत्ता मुझे दीखा। इस बार मुझे बस हल्की सी सिहरन हुई। मैंने सोचा, क्यों यह कुत्ता जीता है? म्युनिसिपाल्टीवाले इसे जहर क्यों नहीं देते? पर आज मैं फिर उसकी तरफ देख नहीं पा रही थी।
आज भी वह कुत्ता उसी जगह बैठा हुआ कभी कभार दिखाई पड़ता है। मैं उसके बारे में सोचती हूं लेकिन मेरे खयालों में अब वह तीव्रता नहीं है। पहले मुझे लगा था कि जीवन का यह घिनौना पहलु देख कर मैं खुद जहर खा लूं, थोड़े दिनों बाद लगा कि उस कुत्ते को जहर देकर मार दूं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। ज़िंदगी चलती रही।
-संध्या, एम ए प्रथम वर्ष, हिंदी विभाग।
पूर्व प्रकाशितः 'दिल्ली' अप्रैल 1982
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