'बस अब और दही नहीं मिलेगा। कल के जामन के लिए थोड़ा रखा है।'
बच्चे से जिस अंदाज में बात करते हैं उसी अंदाज में जब उसने अपने पति से यह बात कही तो उनके साथ खाना खाते खाते मैं सकुचा गई। वह ऐसे बोली थी मानो उस वक्त उनके साथ वहां कोई न हो। लेकिन पति ने उसकी बात हल्के से ली और किसी और विषय पर वह बात करने लगा।
करीब तीन-चार महीनों पहले मंजू और परेश से मेरी पहचान हुई थी। वे लोग अहमदनगर की तरफ के थे और नौकरी की तलाश में हमारे शहर आए हुए थे। मंजू एक विधवा की बेटी थी। मां के अलावा भरी दुनिया में मंजू का कोई और नहीं था। हर तरह की मुश्किलें झेल कर उसकी मां ने उसे पढ़ाया और काबिल बनाया। आज वह एक कॉलेज में लेक्चरार बनी थी तो सिर्फ और सिर्फ अपनी मां के कारण। मंजू को इस बात का खूब अहसास था। वह असल में चाहती यह थी कि मां अब अपनी नौकरी छोड़ कर उनके साथ आकर रहे। लेकिन स्वाभिमानी मां ने यह कह कर मंजू की बात टाल दी कि अब रिटायर होने में चार-पांच साल ही तो बचे हैं। चार-पांच साल नौकरी करने से पेंशन अच्छी बैठेगी।
मंजू की मां एक स्कूल में टीचर थी। मंजू के अलावा उनकी कोई और संतान नहीं थी।
मंजू वैसे तो उनकी बात नहीं मानती लेकिन मां की दी हुई दूसरी वजह ने उसे संकोच में डाला और वह जिद न कर पाई। मां ने कहा था, परेश और तुम्हारी नई नई शादी हुई है। नई गृहस्थी में इस बुढ़िया का क्या काम? दो-चार साल दोनों साथ गुजारो, आपस में अच्छी समझ बन जाएगी। तब तक मैं रिटायर हो जाऊंगी। फिर तो तेरे ही साथ रहना है।
परेश और मंजू एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। मंजू परेश से दो साल बड़ी थी लेकिन दोनों एक-दूसरे की तरफ आकर्षित हुए और उन्होंने अपने प्यार को शादी की मंझिल तक ले जाने का पक्का इरादा बना लिया। दोनों को पता था कि शादी की इजाजत घरवाले देंगे नहीं लिहाजा, दोस्तों की मद से उन्होंने चुपचाप रजिस्ट्रार के दफ्तर जाकर शादी कर ली। उसके बाद परीक्षा दी और एक दिन लड़का घर से ढ़ेर सारे रुपए लेकर भाग निकला। लड़की भी अपने घर से भागी। भागे ज़रूर पर वे दिशाहीन बिल्कुल नहीं थे।
परेश इंजीनियर बनना चाहता था। इंजीनियरी के दूसरे वर्ष की उसकी पढ़ाई जारी थी। मंजू ने एम एसस्सी कर लिया था। वह बॉटनी की लेक्चरर बन कर हमारे कालेज में आई। पहली मुलाकात में ही उसने मेरा दिल जीत लिया और हम दोस्त बन गईं। परेश घर से जो रुपए लेकर आया था वे उसने कुछ बैंक में रखे कुछ घर बसाने में खर्च किए. घर का सामान खरीदा। किराए से घर लिया, उसका डिपॉझिट भरा। उनकी शादीशुदा ज़िंदगी की रेल जीवन की पटरी पर दौड़ने लगी। अब घर का खर्चा चलाने की, परेश को इंजीनियर बनाने की जिम्मेदारी थी मंजू की। जिम्मेदारी के साथ वह नौकरी करती, घर चलाती और परेश का भी खयाल रखती। नई ज़िंदगी की आदत पड़ते पड़ते कब वह मां बनी और कब परेश बच्चा बना इसका उन दोनों को पता ही नहीं चला। धीरे धीरे पूरे घर की जिम्मेदारी मंजू के कंधों पर आई और उसने समय की ज़रूरत समझ कर उसे नाजों से संभाल लिया।
अचानक एक दिन परेश को ढूंढ़ते हुए उसके घरवाले आ धमके। मंजू को गाली-गलौज करते हुए वे दोनों को साथ लेकर गए। चौथे दिन मंजू फिर काम पर हाजिर हुई। परेश के रहने का इंतजाम उसके घरवालों ने होस्टल में कर दिया। लेकिन कोई कहां तक हमेशा उसके साथ रह पाता। कुछ समय बाद घरवाले चले गए तो परेश फिर मंजू के साथ आकर रहने लगा।
मंजू की मां को भी अपनी बेटी का इस तरह ब्याह करना पसंद नहीं आया। लेकिन उन्होंने अपने मन पर पत्थर रखा। बेटी-दामाद को बुला लिया। परेश को दामाद का सम्मान दिया। इसतरह, मंजू-परेश के लिए एक घर के दरवाजे खुले। उनका वहां आना-जाना लगा रहा। नौकरी, घर और परेश की जिम्मेदारी निभाने में मंजू मस्त रहती थी। नई-नई शादी थी सो वह बेहद खुश थी। शादीशुदा होकर भी परेश गृहस्थी की सभी चिंताओं से मुक्त रह कर पढ़ाई करता रहा। रात बिस्तर पर साथ बिताए कुछ पलों के अलावा उसे अपने शादीशुदा होने का अहसास ही नहीं था।
पर लगाए दिन पंछी की तरह उड़ते रहे। पढ़ाई पूरी हुई और एक दिन परेश इंजीनियर भी बन गया। मुझे याद है, रिजल्ट निकलते ही मंजू ने कॉलेज के अपने परिचितों के लिए और परेश के दोस्तों के लिए एक छोटी-सी पार्टी का आयोजन किया था। अपने बलबूते जिम्मेदारी को बखूबी निभाने का गर्व उन दोनों के चेहरों प रझलक रहा था। दोनों बहुत खुश थे और उन्हें बधाई देते हुए हम सब भी खुश थे।
परेश की पहली नौकरी उसके अपने शहर में लगी। वह चाहता था कि बड़े शहर में, अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी मिले। मंजू भी यही चाहती थी। इसलिए दोनों ने तय किया कि, मंजू अपनी नौकरी से इस्तीफा नहीं देगी। परेश अकेला ही जाकर नौकरी जॉइन करेगा। यहां-वहां नौकरी की दरख्वास्तें भेजता रहेगा। जैसे ही ढ़ंग की नौकरी मिलेगी मंजू अपनी नौकरी से इस्तीफा देगी और वे दोनों साथ रहेंगे। हम दोस्तों से मशविरा करते समय अपना नज़रिया रखते हुए उसने कहा भी था - 'अभी परेश की नौकरी नई और अस्थाई है। छोटे शहर में है। तनखा कम है। कंपनी भी कोई बहुत अच्छी नहीं। उसकी तनखा में घर कैसे चलेगा? एकाध साल में उसकी अच्छी नौकरी लग ही जाएगी। तब वे साथ रहने लगेंगे। तब तक वीक-एंड मैरिज एंजॉय करेंगे।' हम सभी दोस्तों को उनके नजरिए में कोई खोट नहीं नजर आई थी।
बिसात हम बिछाते हैं, पांसे भी हम फेंकते हैं लेकिन फल देना ऊपरवाले के हाथ होता है। सपने देखना हमारे हाथ होता है लेकिन कोई नहीं जान पाता कि भविष्य में क्या होनेवाला है।
साल भर में मंजू की ज़िंदगी में कोई फेर-बदलाव नहीं आए।
परेश की ज़िंदगी बशर्ते बदल गई। उसके घर के लोग शुरू से उनकी शादी के खिलाफ थे। अब परेश उनके ही शहर में आकर रह रहा था। गेंद अब उनके पाले में आई थी और उन्होंने खूब फायदा उठाया। मौका पाकर उन्होंने परेश के कान भरने शुरू कर दिया और परेश पर इस मीठे जहर का धीमे धीमे असर होने लगा। अनजाने ही वह बदलने लगा।
नेहा से उसकी मुलाकात हुई। उसे नेहा से प्यार हुआ। परेश की अच्छी जगह नौकरी लगी तो घरवालों ने चुपके से दोनों की शादी करा दी और दोनों को विदेश रवाना किया।
अचानक अखबार में किसी और लड़की के साथ परेश की शादी की तस्वीर देख कर मंजू भौंचक रह गई। तस्वीर के साथ वाली खबर से उसने जाना कि परेश अपनी नई दुलहिन के साथ विदेश रवाना हो चुका है। मंजू को भांपते देर नहीं लगी कि परेश के घरवालों की यह हरकत है। लेकिन क्या परेश बच्चा था कि उसे इसतरह बरगलाया जाए?
मंजू की किसी कोशिश का फिर कोई फायदा नहीं हुआ। परेश का पता ढूंढ़ कर उससे जवाब-तलब करने तक नेहा की गोद में बच्चा आ गया था। नेहा को परेश के पहले ब्याह की कोई जानकारी नहीं थी। परेश ने दो-दो जीवों को ठगा था।
मंजू की दुनिया उजड़ गई। उसे अब किसी पर भरोसा ही नहीं रहा। इन्सानियत पर से उसका विश्वास उठ गया। शादी-ब्याह से मन उचट गया। तलाक लेकर मंजू अकेली ज़िंदगी बसर करने लगी।
आखिर कहां चूक गई मंजू? क्यों फिसल गया परेश? या फिर वे एक-दूसरे के लिए बने ही नहीं थे? परेश को शायद फिर कभी मंजू की याद नहीं आई, लेकिन मंजू आज भी अकेले ज़िंदगी बसर कर रही है।
-संध्या पेडणेकर
बच्चे से जिस अंदाज में बात करते हैं उसी अंदाज में जब उसने अपने पति से यह बात कही तो उनके साथ खाना खाते खाते मैं सकुचा गई। वह ऐसे बोली थी मानो उस वक्त उनके साथ वहां कोई न हो। लेकिन पति ने उसकी बात हल्के से ली और किसी और विषय पर वह बात करने लगा।
करीब तीन-चार महीनों पहले मंजू और परेश से मेरी पहचान हुई थी। वे लोग अहमदनगर की तरफ के थे और नौकरी की तलाश में हमारे शहर आए हुए थे। मंजू एक विधवा की बेटी थी। मां के अलावा भरी दुनिया में मंजू का कोई और नहीं था। हर तरह की मुश्किलें झेल कर उसकी मां ने उसे पढ़ाया और काबिल बनाया। आज वह एक कॉलेज में लेक्चरार बनी थी तो सिर्फ और सिर्फ अपनी मां के कारण। मंजू को इस बात का खूब अहसास था। वह असल में चाहती यह थी कि मां अब अपनी नौकरी छोड़ कर उनके साथ आकर रहे। लेकिन स्वाभिमानी मां ने यह कह कर मंजू की बात टाल दी कि अब रिटायर होने में चार-पांच साल ही तो बचे हैं। चार-पांच साल नौकरी करने से पेंशन अच्छी बैठेगी।
मंजू की मां एक स्कूल में टीचर थी। मंजू के अलावा उनकी कोई और संतान नहीं थी।
मंजू वैसे तो उनकी बात नहीं मानती लेकिन मां की दी हुई दूसरी वजह ने उसे संकोच में डाला और वह जिद न कर पाई। मां ने कहा था, परेश और तुम्हारी नई नई शादी हुई है। नई गृहस्थी में इस बुढ़िया का क्या काम? दो-चार साल दोनों साथ गुजारो, आपस में अच्छी समझ बन जाएगी। तब तक मैं रिटायर हो जाऊंगी। फिर तो तेरे ही साथ रहना है।
परेश और मंजू एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। मंजू परेश से दो साल बड़ी थी लेकिन दोनों एक-दूसरे की तरफ आकर्षित हुए और उन्होंने अपने प्यार को शादी की मंझिल तक ले जाने का पक्का इरादा बना लिया। दोनों को पता था कि शादी की इजाजत घरवाले देंगे नहीं लिहाजा, दोस्तों की मद से उन्होंने चुपचाप रजिस्ट्रार के दफ्तर जाकर शादी कर ली। उसके बाद परीक्षा दी और एक दिन लड़का घर से ढ़ेर सारे रुपए लेकर भाग निकला। लड़की भी अपने घर से भागी। भागे ज़रूर पर वे दिशाहीन बिल्कुल नहीं थे।
परेश इंजीनियर बनना चाहता था। इंजीनियरी के दूसरे वर्ष की उसकी पढ़ाई जारी थी। मंजू ने एम एसस्सी कर लिया था। वह बॉटनी की लेक्चरर बन कर हमारे कालेज में आई। पहली मुलाकात में ही उसने मेरा दिल जीत लिया और हम दोस्त बन गईं। परेश घर से जो रुपए लेकर आया था वे उसने कुछ बैंक में रखे कुछ घर बसाने में खर्च किए. घर का सामान खरीदा। किराए से घर लिया, उसका डिपॉझिट भरा। उनकी शादीशुदा ज़िंदगी की रेल जीवन की पटरी पर दौड़ने लगी। अब घर का खर्चा चलाने की, परेश को इंजीनियर बनाने की जिम्मेदारी थी मंजू की। जिम्मेदारी के साथ वह नौकरी करती, घर चलाती और परेश का भी खयाल रखती। नई ज़िंदगी की आदत पड़ते पड़ते कब वह मां बनी और कब परेश बच्चा बना इसका उन दोनों को पता ही नहीं चला। धीरे धीरे पूरे घर की जिम्मेदारी मंजू के कंधों पर आई और उसने समय की ज़रूरत समझ कर उसे नाजों से संभाल लिया।
अचानक एक दिन परेश को ढूंढ़ते हुए उसके घरवाले आ धमके। मंजू को गाली-गलौज करते हुए वे दोनों को साथ लेकर गए। चौथे दिन मंजू फिर काम पर हाजिर हुई। परेश के रहने का इंतजाम उसके घरवालों ने होस्टल में कर दिया। लेकिन कोई कहां तक हमेशा उसके साथ रह पाता। कुछ समय बाद घरवाले चले गए तो परेश फिर मंजू के साथ आकर रहने लगा।
मंजू की मां को भी अपनी बेटी का इस तरह ब्याह करना पसंद नहीं आया। लेकिन उन्होंने अपने मन पर पत्थर रखा। बेटी-दामाद को बुला लिया। परेश को दामाद का सम्मान दिया। इसतरह, मंजू-परेश के लिए एक घर के दरवाजे खुले। उनका वहां आना-जाना लगा रहा। नौकरी, घर और परेश की जिम्मेदारी निभाने में मंजू मस्त रहती थी। नई-नई शादी थी सो वह बेहद खुश थी। शादीशुदा होकर भी परेश गृहस्थी की सभी चिंताओं से मुक्त रह कर पढ़ाई करता रहा। रात बिस्तर पर साथ बिताए कुछ पलों के अलावा उसे अपने शादीशुदा होने का अहसास ही नहीं था।
पर लगाए दिन पंछी की तरह उड़ते रहे। पढ़ाई पूरी हुई और एक दिन परेश इंजीनियर भी बन गया। मुझे याद है, रिजल्ट निकलते ही मंजू ने कॉलेज के अपने परिचितों के लिए और परेश के दोस्तों के लिए एक छोटी-सी पार्टी का आयोजन किया था। अपने बलबूते जिम्मेदारी को बखूबी निभाने का गर्व उन दोनों के चेहरों प रझलक रहा था। दोनों बहुत खुश थे और उन्हें बधाई देते हुए हम सब भी खुश थे।
परेश की पहली नौकरी उसके अपने शहर में लगी। वह चाहता था कि बड़े शहर में, अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी मिले। मंजू भी यही चाहती थी। इसलिए दोनों ने तय किया कि, मंजू अपनी नौकरी से इस्तीफा नहीं देगी। परेश अकेला ही जाकर नौकरी जॉइन करेगा। यहां-वहां नौकरी की दरख्वास्तें भेजता रहेगा। जैसे ही ढ़ंग की नौकरी मिलेगी मंजू अपनी नौकरी से इस्तीफा देगी और वे दोनों साथ रहेंगे। हम दोस्तों से मशविरा करते समय अपना नज़रिया रखते हुए उसने कहा भी था - 'अभी परेश की नौकरी नई और अस्थाई है। छोटे शहर में है। तनखा कम है। कंपनी भी कोई बहुत अच्छी नहीं। उसकी तनखा में घर कैसे चलेगा? एकाध साल में उसकी अच्छी नौकरी लग ही जाएगी। तब वे साथ रहने लगेंगे। तब तक वीक-एंड मैरिज एंजॉय करेंगे।' हम सभी दोस्तों को उनके नजरिए में कोई खोट नहीं नजर आई थी।
बिसात हम बिछाते हैं, पांसे भी हम फेंकते हैं लेकिन फल देना ऊपरवाले के हाथ होता है। सपने देखना हमारे हाथ होता है लेकिन कोई नहीं जान पाता कि भविष्य में क्या होनेवाला है।
साल भर में मंजू की ज़िंदगी में कोई फेर-बदलाव नहीं आए।
परेश की ज़िंदगी बशर्ते बदल गई। उसके घर के लोग शुरू से उनकी शादी के खिलाफ थे। अब परेश उनके ही शहर में आकर रह रहा था। गेंद अब उनके पाले में आई थी और उन्होंने खूब फायदा उठाया। मौका पाकर उन्होंने परेश के कान भरने शुरू कर दिया और परेश पर इस मीठे जहर का धीमे धीमे असर होने लगा। अनजाने ही वह बदलने लगा।
नेहा से उसकी मुलाकात हुई। उसे नेहा से प्यार हुआ। परेश की अच्छी जगह नौकरी लगी तो घरवालों ने चुपके से दोनों की शादी करा दी और दोनों को विदेश रवाना किया।
अचानक अखबार में किसी और लड़की के साथ परेश की शादी की तस्वीर देख कर मंजू भौंचक रह गई। तस्वीर के साथ वाली खबर से उसने जाना कि परेश अपनी नई दुलहिन के साथ विदेश रवाना हो चुका है। मंजू को भांपते देर नहीं लगी कि परेश के घरवालों की यह हरकत है। लेकिन क्या परेश बच्चा था कि उसे इसतरह बरगलाया जाए?
मंजू की किसी कोशिश का फिर कोई फायदा नहीं हुआ। परेश का पता ढूंढ़ कर उससे जवाब-तलब करने तक नेहा की गोद में बच्चा आ गया था। नेहा को परेश के पहले ब्याह की कोई जानकारी नहीं थी। परेश ने दो-दो जीवों को ठगा था।
मंजू की दुनिया उजड़ गई। उसे अब किसी पर भरोसा ही नहीं रहा। इन्सानियत पर से उसका विश्वास उठ गया। शादी-ब्याह से मन उचट गया। तलाक लेकर मंजू अकेली ज़िंदगी बसर करने लगी।
आखिर कहां चूक गई मंजू? क्यों फिसल गया परेश? या फिर वे एक-दूसरे के लिए बने ही नहीं थे? परेश को शायद फिर कभी मंजू की याद नहीं आई, लेकिन मंजू आज भी अकेले ज़िंदगी बसर कर रही है।
-संध्या पेडणेकर
