- संध्या पेडणेकर
`आप कहाँ उतरेंगी बहनजी?'
सवाल के साथ कंधे पर हुए स्पर्श ने तारा की तन्द्रा तोड़ दी. तो क्या? ....तारा एकदम निढाल हो आयी. बाहर घुमड़ती बारिश से बदन पूरा निचुड़ सा गया था. लोकल की दमघोंटू बदबू से अब उसका जी मिचलाने लगा. जीभ पर तल्खी आयी और उसने सोचा, कि तन्द्रा में उसने एक सुंदर सजावटी पीस तैयार किया. दिमाग के चौखटे में कल्पना और चाहत के रंगों से एक सुंदर, चटख रंगों वाली सुखी घर की तस्वीर. लोकल में उपस्थित लगभग हर महिला अपने सुखी परिवार की व्याख्या करते हुए हंसी-ख़ुशी जिस तस्वीर को पेश कर सके ऐसी तस्वीर. लेकिन ऐसी तस्वीरों के पीछे से झांकती उनकी बेबसी छिपाए नहीं छिपती की आज सुबह बंद गोभी काटकर रखने के लिए समय ही नहीं मिला. बबलू के युनिफ़ोर्म के टाँके उधड गए हैं, मुन्नी के छिले पैर पर बैंडेज करवानी है, मुन्ने की दवाई के समय से पहले घर पहुँचना है और सुनील अगर चक्की से पिसे आटे की बोरी लाना अगर आज भी भूल जाए तो तीसरी मंजिल से सुबह उतरकर आटा ले जाना पडेगा तब जाकर कहीं फुलके बनेंगे. लेडीज कम्पार्टमेंट में बैठी उन महिलाओं के चेहरे से टपकती कातरता और शर्मिंदगी की नाप से उनका पारीवारिक जीवन अनुपाततया श्रेष्ठ, उत्तम बनता जाता है. ऐसी ही एक तस्वीर उसने भी खींची, बस.
कल्पना में भी पति की दहशत से मुक्त न हो पाती अपनी बुद्धि पर तारा को तरस आया. दफ्तर की अन्य महिलाओं की तुलना में भले ही कल्पना से निर्मित उसका पति मानवीय रहा हो, फिर भी उसकी काल्पनिक नायिका के मन में घर देर से पहुंचने की मजबूरी में दहशत भर ही आई। वजह कुछ भी हो, तारा को लगा कि स्त्री के मन में ऐसा अपराधभाव क्यों जागे?
शादी न करने का फैसला करनेवाली औरतों के प्रति तारा के मन में गहरा आदर था। उसे लगता, एक तो वे शादीशुदा जिंदगी के सभी स्वप्नों में दूर के ढोल सुहावने इस नाते झट विश्वास कर बैठती हैं, शादीशुदा जिंदगी उनके लिए हमेशा एक सुंदर ख्वाब बनी रहती है। ऐसा ख्वाब, जिसे उन्होंने अपनी मर्जी से त्याग दिया, और अगर चाहें तो जिसे कभी भी पूरा कर सकती हैं। साथ ही, अपनी मर्जी से काम और आराम फरमाने के उनके हक भी सुरक्षित रहते हैं।
तारा को लगा, यह विश्वासवाली बात काफी अहम् है। आमतौर पर बातें अपनी वास्तविकता में इतनी ऊलजलूल होती हैं कि उनसे साबका पते ही व्यक्ति बातों की सरलता पर का अपना विशअवास ही खो बैठता है। मिसाल के तौर प रकोई बहुत ही नार्मल, मानवीय बात भी अपवादस्वरूप सच मानने से उनका मन कतरा जाता है। तारा को लगा कि उसने आखिर ऐसी कौनसी बात की है जिसकी खातिर उसे यह सब सहना पड रहा है? उसके सामने जीवन की एक एक कडी खुलती चली गई।
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कितने सुहाने थे वे दिन। कालेज की शिक्षा से खत्म होते होते नौकरी पायी। सहेलियों के साथ बिताए वे दिन। सबकुछ इतनी जल्दी बीत गया कि आज उन यादों की एक धुंधली तस्वीर भर उसके पास बची है।
उन्हीं दिनों राबर्ट से उसकी मुलाकात हुई थी। निश्छल व्यक्ति दुनिया की सरलता पर कितनी सहजता से विश्वास कर बैठता है। छोटी-सी मुलाकात को राबर्ट की खास कोशिशों ने ही दोस्ती तक पहुंचाया था। एक दिन अचानक राबर्ट ने ताार के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। तारा की खुशी का कोई ठिकाना न रहा जब आश्रम के अधिकारियों ने तारा को राबर्ट के साथ विवाह करने की अनुमति दे दी। बडी उमंग से उसने खरीदारी के लिए राबर्ट के घरवालों के साथ जाने की बात कही तो राबर्ट ने बताया कि उसके घरवालों को यह शादी मंजूर नहीं और वे शादी की किसी रस्म में शरीक नहीं होंगे। तारा को अपने यतीम होने का और दुनियावालों के अपने प्रति व्यवहार का पूरा अहसास था। उसने सोचा कि शादी के बाद सब ठीक ही होगा। लेकिन, अफसोस कि वह गलत साबित हुई।
राबर्ट के घरवाले इस शादी के खिलाफ थे। और राबर्ट-तारा की छह साल की शादीशुदा जिंदगी के दौरान, उनकी पुत्री के पैदा होने, पलने-बढने के दौरान भी रॉबर्ट के मतानुसार वे नाराज ही रहे। अनाथाश्रम में पली तारा का भरे-पूरे घर में बसने का, एकत्रित परिवार का सपना चटख गया। पर छह सालों बाद एक दिन जब रॉबर्ट भी घर से गायब हो गया तो उसके अपने परिवार के सीमित सपनों में भी शोले दहक गए। दो सालों तक रॉबर्ट तक पहुंचने की तारा की हर कोशिश नाकामयाब रही। दो साल बाद एक दिन अचानक डाक से रॉबर्ट की लिखावटवाला खत देख कर उसने सुख की कामना से धडकते दिल से लिफाफा खोला तो उसके हाथ आयी – तलाक की पेटीशन. रॉबर्ट ने दो सालों के विभक्त जीवन के आधार पर तलाक की मांग की थी। अब तारा करे भी तो क्या
तलाक ने तारा को बुरी तरह परास्त किया पर तारा को इस बात का अहसास होते होते साल भर बीत गया। रामनवाला किस्सा न होता अपनी विरक्ति में तारा को शायद अंत तक पता नहीं चलता कि वह किस कदर टूट गई है। रामन तारा के ही दफ्तर में काम करता था। रॉबर्ट और तारा के मामले में उसने सिरे से तारा की मदद की थी। हमेशा वह तारा के साथ रहा था। विधुर था, उसका अपना कोई घर-परिवार नहीं था। तारा-रॉबर्ट के घर में ही उसे अपने परिवार सा अपनत्व महसूस होता। उसने तारा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। तारा को तब अपनी थकान का अहसास हुआ। काफी सोचने-विचारने के बाद उसे लगा कि अब कोई स्वप्न देखने की अपनी मासूमियत वह खो बैठी है। हामी भर कर कहीं वह रामन के साथ अन्याय न कर बैठती
रामन ने फिर उनके दफ्तर के पडोसवाली बिल्डिंग में काम करनेवाली एक व्यस्क लॆकी से शादी कर ली। उन दोनों ने तारा और उसकी बेटी को अपने घर खाने पर आमंत्रित किया ।उनके संबंधों में तब उसे अपने सपनों की धुधली झलक महसूस हुई थी। उस दंपति के वर्तमान सुख के पीछे से झांकता अनजान भविषअय उसे काफी डरावना लगा। खालिस सोने की चमक कायम रहती है। पर सोना होने का दावा करती चीज की चमक पीछे अगर हलकी पड जाए तो खालिस सोने की चाहत और नकली सोने की संगत में मेल बिठाते बिठाते जिंदगी जर्जर हो जाती है।
तारा का जीवन खाली था, लेकिन उस दिन के बाद से उसे उस खालीपन का अहसास कचोटने लगा। अब घर के कामों से उसे काफी थकान महसूस होती। उसके मुरझाए चेहरे की ओर देख कर अचानक सयानी हुई उसकी बेटी को देख कर उसका जी भर आता। बेटी के लिए बांझ प्रेम और रहम से उसका जी रिसने लगता। दफ्तर के कामों में उससे इन दिनों कई गलतियां हुईं। घर-दफ्तर-घर का सफर वह बिल्कुल निस्पंद, निर्विकार तय करती मानो किसी जगह के उसके लिए कोई मायने ही नहीं रहे थे।
एक दिन लोकल में महिलाओं की खिलखिलाहट के बीच से उभरती एक पैनी आवाज तारा के जहन में सुई सी चुभ गई। उस आवाज को पहचानने में उसे देर नहीं लगी। कई दिनों बाद आज वह बुढिया उस डिब्बे में दिखाई दे रही थी। गानेवाली बुढिया। बाकी सब औतें उससे इतने दिनों तक गायब रहने का कारण पूछ रही थीं। बुढिया बोलने के लिए राजी नहीं लग रही थी। सभी सवालों के जवाब में उसने जब मुंह खोला तो उसमें से एक तान निकल गई –
माझ्या माहेराच्या दारी
लाडू-पेढ्यांची गं वाट
खीर बासुंदीची नदी
दूधा-दह्याचे ग पाट।।
काठी अंब्यांची गं गर्दी
साद घालिते कोकीळ
दारी पसरून उभी
माया पदराची माय।।
चला चला गं सयांनो सुख प्याया घोट घोट
उद्या आहेच सासरी
पुन्हा परतीची वाट.....
(मेरे मायके की राहों में लड्डू-पेडे बिछए रहते हैं, दूध-दही-रबडी की नदियां बहती हैं, जिनके किनारे खडे आम्रवन में कोयल की कूक गूंजती रहती है। घर की चौखट में खडी ममता का पल्लू बिछाए मां हमेशा मेरी राह देखती रहती है। सखी, सुक के घूंट पीने चलना मेरे साथ, कल फिर ससुराल की राह लौटना ही है....)
नहीं दादी, गीत की पंक्तियां तुम हर बार बदल देती हो। सोलह साल की एक लडकी ने बुढिया को बीच में टोका तो बुढिया बोल पडी,
सुख की जाति अलग अलग ही तो होती है बिटिया। शब्दों का अंबार बीनते हुए हर बार लगता है कि अब पकड लिया लेकिन, सुख का एक बाल भी पकड में नहीं आता और जिंदगी फिसल जाती है। ...संभल के रहना बिट्टो...बहकावे में आई तो फुसलाकर सुख तुम्हें ऐसी जगह ले जाकर पटकेगा कि अपना पता पूछते पूछते खो जाओगी।
दादी, कुछ और गाओ ना. दूसरी फर्माईश पर गौर करते हुए बुढिया कुछ देर तक चुप रही। ट्रेन रुकी तो उतरनेवालों की भीड में बुढिाय को देख तारा के पैर हरकत में आए। छंटती भीड में बुढिया के साथ होते हुए उसने धीरे से आवाज दी – अम्मा...
बुढिया ने पीछए मुड कर देखा। नजर से नजर मिली तो सदियों पुराना दुख परिचय का मोहताज न रहा। साथ चलतेहुए तारा ने पूछा,
कहां रहती हो अम्मा
जरीमरी में बेटे
घर है
घर तो भागवानों के होते हैं बिटिया, अपनी तो बस ससुराल है।
कौन कौन है
मैं हूं, मेरे गीत हैं और जब गीत नहीं होते तो खामोसी होती है....
अकेली हो
अकेली कहां दुख के ससुराल से नाता है। वह भी साथ रहता है। लेकिन अब उसके साथ की ऐसी आदत पड गई है कि मैं उसकी अलग पहचान भी भूलसी गई हूं।
क्या काम करती हो. पढी हो.
खाना पकाती हूं मेमसाब के यहां। वहीं खा-पी लेती हूं। पहले रह भी वहीं लेती थी, लेकिन मेरे गीत मेमसाब को पराए लगे। मैं भला गीतों से नाता कैसे तोड सकती हूं।
मां-बाप, भाई-बहन, पति-बच्चे कोई नहीं
हैं क्यों नहीं.. बुढिया एकदम तुनक गई। तुमने मुझे क्या अनाथ समझ रखा है. सब हैं। ...मां गुजर गई कुछ दिनों पहले। बाप को भाई-भाभी पालते हैं, मेरा बो झवे क्योंकर उठाएंगे. बहनों की शादी हो गई है, वे अपने अपने घरों में हैं। पति ने दूसरी औरत रख लीहै और बच्चे आवारगी करते हैं.
पूरी बातचीत में सलीकेके दो वाक्य अभी बुढिया बोली थी पर उनमें ऐसी कटुता थी कि निगलते हुए तारा का दम घुट गया। तारा चुप रही।
अरे जल्दी चलो, मेरी बेटी आई है..
ताराउलझन में पड गई। बुढिया ने अपनी बेटी का जिक्र तो नहीं किया था। झोपडे में कदम रखने के बाद सामान के बक्से पर बैठी तारा को देख कर एक बार फिर तारा को आशअचर्य हुआ।
थक गई है गंगा. मैं अभी चाय बनाती हूं।
मैं तेरी चाय पीने नहीं आई। एक-दो गीत सुना दे। मैं चलूं फिर. आज देर कर दी तूने लौटने में. और ये कौन है तेरे साथ।
ये भी मेरी बिटिया है गंगा, बिल्कुल तेरी तरह. अरे, बैठ ना, तू खडी क्यों है।
अम्मा, वो नीचे कैसे बैठेगी। साडी खराब नहीं होगी उसकी। आ बहन, यहां बैठ जा तू, मैं नीचे बैठ लूं।
तारा खिजला गई। गंगा ने उसके संकोच को एकदम नंगा कर दिया था। पर गंगा पर नजर पडते ही वह अपनी खिजलाहट भूल गई। गंगा पैरों से लूली थी। अम्मा ने बताया कि वह भी कहीं खाना पकाने-परोसने का काम करती है। वहीं रहती है। असल में गंगा भागवान है, उसकी मालकिन ने गंगा के दुख की जात से अपने दुख की जात छिपाई नहीं। परोसने में देरी पर बच्चे जब गंगा पर चीखने लगते हैं तो वह खुद उठ कर खाना परोसती है। इतना ही नहीं, पढने के लिए गंगा के लिए वह नई नई किताबें भी लाकर देती हैं। गंगा का भाई मिलिट्री में सूबेदार है और इसी शहर में अपने बीबी-बच्चों के साथ रहता है। पर....
तारा को अंदर सेमानो किसीने झकझोर दिया हो। उसे अपनी बच्ची की याद आई और लगा कि घर पहुंचने में उसे देर हो रही है। बुढिया और गंगा की इजाजत लेकर वह घर की ओर चल पडी। लोकल में चढते वक्त उसका पैर एक औरत के पैर पर पडा। तारा ने सॉरी कहा तो वह औरत मुस्करा दी। तारा के होंठ भी अनजाने ही मुस्कुराहट में फैल गए। बहुत भीड थी, पर तारा जहां खडी थी वहां बैठी औरत ने तारा की थकान महसूस कर तोडी देर उसे अपनी सीट दे दी। इतनी भीड में भी बच्चे को गोद में लटकाए सौदा बेचती औरत से तारा ने अपनी बच्ची के लिए मोतियों की माला खरीदी। रेजगारी लौटाते वक्त वह औरत तारा की ओर देख कर मुस्कुराई तो ताार को लगा कि उसमें और उस औरत में एक अनजान रिशअता है।
गाडी में आज उसकी नजर ने सभी चेहरों को, सभी चाजों को टटोला। सोई बच्ची का सिर गोद में रखे सब्जी खरीदती गृहिणी, उसके सामने खडी बच्ची को निर्निमेश नजरों से देखती अविवाहिता, आंखों में आतुरता लिए किताबें संभालती हुई सपनों में खोई, बार बार खिडकी से झांकती षोडशी, नशे में दूसरों पर गिर गिर जाती मजदूरन, शराब की बदबू पर नाक सिकोडती लेकिन मजदूरन को हौले से सहारा देती उसके आसपास खडी औरतें, ट्रेन की दीवारों पर लगे पोस्टर – गर्भपात केवल 100 रुपयों में, अत्याचार के खिलाफ संगठित आवाज उठाओ, युवतियों की राज्यव्यापी परिषद, बच्चे को सही समय टीका लगाओ, जीवन बीमा निगम.....उसे लगा कि आज वह कई दिनों बाद घर लौट रही है। पुल से गुजरती ट्रेन की गुर्राहट से उसके पेट में कुछ ऊपर-नीचे हुआ, खिडकी से एक बार गंदी बू आई तो अपने आप उसकी नाक सिकुड गई, यहां तक कि ट्रेन से उतरते हुए उसने एक महिला को सुना भी दिया कि उतरनेवालों की भीड से परे होकर खडी रहो वरना उतरनेवालों की भीड तुम्हें ठेल कर नीचे ले जाएगी। ट्रेन से उतरते ही तारा के पैरों में गति आई और सधए कदमों से वह आगे चली।
सवाल के साथ कंधे पर हुए स्पर्श ने तारा की तन्द्रा तोड़ दी. तो क्या? ....तारा एकदम निढाल हो आयी. बाहर घुमड़ती बारिश से बदन पूरा निचुड़ सा गया था. लोकल की दमघोंटू बदबू से अब उसका जी मिचलाने लगा. जीभ पर तल्खी आयी और उसने सोचा, कि तन्द्रा में उसने एक सुंदर सजावटी पीस तैयार किया. दिमाग के चौखटे में कल्पना और चाहत के रंगों से एक सुंदर, चटख रंगों वाली सुखी घर की तस्वीर. लोकल में उपस्थित लगभग हर महिला अपने सुखी परिवार की व्याख्या करते हुए हंसी-ख़ुशी जिस तस्वीर को पेश कर सके ऐसी तस्वीर. लेकिन ऐसी तस्वीरों के पीछे से झांकती उनकी बेबसी छिपाए नहीं छिपती की आज सुबह बंद गोभी काटकर रखने के लिए समय ही नहीं मिला. बबलू के युनिफ़ोर्म के टाँके उधड गए हैं, मुन्नी के छिले पैर पर बैंडेज करवानी है, मुन्ने की दवाई के समय से पहले घर पहुँचना है और सुनील अगर चक्की से पिसे आटे की बोरी लाना अगर आज भी भूल जाए तो तीसरी मंजिल से सुबह उतरकर आटा ले जाना पडेगा तब जाकर कहीं फुलके बनेंगे. लेडीज कम्पार्टमेंट में बैठी उन महिलाओं के चेहरे से टपकती कातरता और शर्मिंदगी की नाप से उनका पारीवारिक जीवन अनुपाततया श्रेष्ठ, उत्तम बनता जाता है. ऐसी ही एक तस्वीर उसने भी खींची, बस.
कल्पना में भी पति की दहशत से मुक्त न हो पाती अपनी बुद्धि पर तारा को तरस आया. दफ्तर की अन्य महिलाओं की तुलना में भले ही कल्पना से निर्मित उसका पति मानवीय रहा हो, फिर भी उसकी काल्पनिक नायिका के मन में घर देर से पहुंचने की मजबूरी में दहशत भर ही आई। वजह कुछ भी हो, तारा को लगा कि स्त्री के मन में ऐसा अपराधभाव क्यों जागे?
शादी न करने का फैसला करनेवाली औरतों के प्रति तारा के मन में गहरा आदर था। उसे लगता, एक तो वे शादीशुदा जिंदगी के सभी स्वप्नों में दूर के ढोल सुहावने इस नाते झट विश्वास कर बैठती हैं, शादीशुदा जिंदगी उनके लिए हमेशा एक सुंदर ख्वाब बनी रहती है। ऐसा ख्वाब, जिसे उन्होंने अपनी मर्जी से त्याग दिया, और अगर चाहें तो जिसे कभी भी पूरा कर सकती हैं। साथ ही, अपनी मर्जी से काम और आराम फरमाने के उनके हक भी सुरक्षित रहते हैं।
तारा को लगा, यह विश्वासवाली बात काफी अहम् है। आमतौर पर बातें अपनी वास्तविकता में इतनी ऊलजलूल होती हैं कि उनसे साबका पते ही व्यक्ति बातों की सरलता पर का अपना विशअवास ही खो बैठता है। मिसाल के तौर प रकोई बहुत ही नार्मल, मानवीय बात भी अपवादस्वरूप सच मानने से उनका मन कतरा जाता है। तारा को लगा कि उसने आखिर ऐसी कौनसी बात की है जिसकी खातिर उसे यह सब सहना पड रहा है? उसके सामने जीवन की एक एक कडी खुलती चली गई।
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कितने सुहाने थे वे दिन। कालेज की शिक्षा से खत्म होते होते नौकरी पायी। सहेलियों के साथ बिताए वे दिन। सबकुछ इतनी जल्दी बीत गया कि आज उन यादों की एक धुंधली तस्वीर भर उसके पास बची है।
उन्हीं दिनों राबर्ट से उसकी मुलाकात हुई थी। निश्छल व्यक्ति दुनिया की सरलता पर कितनी सहजता से विश्वास कर बैठता है। छोटी-सी मुलाकात को राबर्ट की खास कोशिशों ने ही दोस्ती तक पहुंचाया था। एक दिन अचानक राबर्ट ने ताार के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। तारा की खुशी का कोई ठिकाना न रहा जब आश्रम के अधिकारियों ने तारा को राबर्ट के साथ विवाह करने की अनुमति दे दी। बडी उमंग से उसने खरीदारी के लिए राबर्ट के घरवालों के साथ जाने की बात कही तो राबर्ट ने बताया कि उसके घरवालों को यह शादी मंजूर नहीं और वे शादी की किसी रस्म में शरीक नहीं होंगे। तारा को अपने यतीम होने का और दुनियावालों के अपने प्रति व्यवहार का पूरा अहसास था। उसने सोचा कि शादी के बाद सब ठीक ही होगा। लेकिन, अफसोस कि वह गलत साबित हुई।
राबर्ट के घरवाले इस शादी के खिलाफ थे। और राबर्ट-तारा की छह साल की शादीशुदा जिंदगी के दौरान, उनकी पुत्री के पैदा होने, पलने-बढने के दौरान भी रॉबर्ट के मतानुसार वे नाराज ही रहे। अनाथाश्रम में पली तारा का भरे-पूरे घर में बसने का, एकत्रित परिवार का सपना चटख गया। पर छह सालों बाद एक दिन जब रॉबर्ट भी घर से गायब हो गया तो उसके अपने परिवार के सीमित सपनों में भी शोले दहक गए। दो सालों तक रॉबर्ट तक पहुंचने की तारा की हर कोशिश नाकामयाब रही। दो साल बाद एक दिन अचानक डाक से रॉबर्ट की लिखावटवाला खत देख कर उसने सुख की कामना से धडकते दिल से लिफाफा खोला तो उसके हाथ आयी – तलाक की पेटीशन. रॉबर्ट ने दो सालों के विभक्त जीवन के आधार पर तलाक की मांग की थी। अब तारा करे भी तो क्या
तलाक ने तारा को बुरी तरह परास्त किया पर तारा को इस बात का अहसास होते होते साल भर बीत गया। रामनवाला किस्सा न होता अपनी विरक्ति में तारा को शायद अंत तक पता नहीं चलता कि वह किस कदर टूट गई है। रामन तारा के ही दफ्तर में काम करता था। रॉबर्ट और तारा के मामले में उसने सिरे से तारा की मदद की थी। हमेशा वह तारा के साथ रहा था। विधुर था, उसका अपना कोई घर-परिवार नहीं था। तारा-रॉबर्ट के घर में ही उसे अपने परिवार सा अपनत्व महसूस होता। उसने तारा के सामने शादी का प्रस्ताव रखा। तारा को तब अपनी थकान का अहसास हुआ। काफी सोचने-विचारने के बाद उसे लगा कि अब कोई स्वप्न देखने की अपनी मासूमियत वह खो बैठी है। हामी भर कर कहीं वह रामन के साथ अन्याय न कर बैठती
रामन ने फिर उनके दफ्तर के पडोसवाली बिल्डिंग में काम करनेवाली एक व्यस्क लॆकी से शादी कर ली। उन दोनों ने तारा और उसकी बेटी को अपने घर खाने पर आमंत्रित किया ।उनके संबंधों में तब उसे अपने सपनों की धुधली झलक महसूस हुई थी। उस दंपति के वर्तमान सुख के पीछे से झांकता अनजान भविषअय उसे काफी डरावना लगा। खालिस सोने की चमक कायम रहती है। पर सोना होने का दावा करती चीज की चमक पीछे अगर हलकी पड जाए तो खालिस सोने की चाहत और नकली सोने की संगत में मेल बिठाते बिठाते जिंदगी जर्जर हो जाती है।
तारा का जीवन खाली था, लेकिन उस दिन के बाद से उसे उस खालीपन का अहसास कचोटने लगा। अब घर के कामों से उसे काफी थकान महसूस होती। उसके मुरझाए चेहरे की ओर देख कर अचानक सयानी हुई उसकी बेटी को देख कर उसका जी भर आता। बेटी के लिए बांझ प्रेम और रहम से उसका जी रिसने लगता। दफ्तर के कामों में उससे इन दिनों कई गलतियां हुईं। घर-दफ्तर-घर का सफर वह बिल्कुल निस्पंद, निर्विकार तय करती मानो किसी जगह के उसके लिए कोई मायने ही नहीं रहे थे।
एक दिन लोकल में महिलाओं की खिलखिलाहट के बीच से उभरती एक पैनी आवाज तारा के जहन में सुई सी चुभ गई। उस आवाज को पहचानने में उसे देर नहीं लगी। कई दिनों बाद आज वह बुढिया उस डिब्बे में दिखाई दे रही थी। गानेवाली बुढिया। बाकी सब औतें उससे इतने दिनों तक गायब रहने का कारण पूछ रही थीं। बुढिया बोलने के लिए राजी नहीं लग रही थी। सभी सवालों के जवाब में उसने जब मुंह खोला तो उसमें से एक तान निकल गई –
माझ्या माहेराच्या दारी
लाडू-पेढ्यांची गं वाट
खीर बासुंदीची नदी
दूधा-दह्याचे ग पाट।।
काठी अंब्यांची गं गर्दी
साद घालिते कोकीळ
दारी पसरून उभी
माया पदराची माय।।
चला चला गं सयांनो सुख प्याया घोट घोट
उद्या आहेच सासरी
पुन्हा परतीची वाट.....
(मेरे मायके की राहों में लड्डू-पेडे बिछए रहते हैं, दूध-दही-रबडी की नदियां बहती हैं, जिनके किनारे खडे आम्रवन में कोयल की कूक गूंजती रहती है। घर की चौखट में खडी ममता का पल्लू बिछाए मां हमेशा मेरी राह देखती रहती है। सखी, सुक के घूंट पीने चलना मेरे साथ, कल फिर ससुराल की राह लौटना ही है....)
नहीं दादी, गीत की पंक्तियां तुम हर बार बदल देती हो। सोलह साल की एक लडकी ने बुढिया को बीच में टोका तो बुढिया बोल पडी,
सुख की जाति अलग अलग ही तो होती है बिटिया। शब्दों का अंबार बीनते हुए हर बार लगता है कि अब पकड लिया लेकिन, सुख का एक बाल भी पकड में नहीं आता और जिंदगी फिसल जाती है। ...संभल के रहना बिट्टो...बहकावे में आई तो फुसलाकर सुख तुम्हें ऐसी जगह ले जाकर पटकेगा कि अपना पता पूछते पूछते खो जाओगी।
दादी, कुछ और गाओ ना. दूसरी फर्माईश पर गौर करते हुए बुढिया कुछ देर तक चुप रही। ट्रेन रुकी तो उतरनेवालों की भीड में बुढिाय को देख तारा के पैर हरकत में आए। छंटती भीड में बुढिया के साथ होते हुए उसने धीरे से आवाज दी – अम्मा...
बुढिया ने पीछए मुड कर देखा। नजर से नजर मिली तो सदियों पुराना दुख परिचय का मोहताज न रहा। साथ चलतेहुए तारा ने पूछा,
कहां रहती हो अम्मा
जरीमरी में बेटे
घर है
घर तो भागवानों के होते हैं बिटिया, अपनी तो बस ससुराल है।
कौन कौन है
मैं हूं, मेरे गीत हैं और जब गीत नहीं होते तो खामोसी होती है....
अकेली हो
अकेली कहां दुख के ससुराल से नाता है। वह भी साथ रहता है। लेकिन अब उसके साथ की ऐसी आदत पड गई है कि मैं उसकी अलग पहचान भी भूलसी गई हूं।
क्या काम करती हो. पढी हो.
खाना पकाती हूं मेमसाब के यहां। वहीं खा-पी लेती हूं। पहले रह भी वहीं लेती थी, लेकिन मेरे गीत मेमसाब को पराए लगे। मैं भला गीतों से नाता कैसे तोड सकती हूं।
मां-बाप, भाई-बहन, पति-बच्चे कोई नहीं
हैं क्यों नहीं.. बुढिया एकदम तुनक गई। तुमने मुझे क्या अनाथ समझ रखा है. सब हैं। ...मां गुजर गई कुछ दिनों पहले। बाप को भाई-भाभी पालते हैं, मेरा बो झवे क्योंकर उठाएंगे. बहनों की शादी हो गई है, वे अपने अपने घरों में हैं। पति ने दूसरी औरत रख लीहै और बच्चे आवारगी करते हैं.
पूरी बातचीत में सलीकेके दो वाक्य अभी बुढिया बोली थी पर उनमें ऐसी कटुता थी कि निगलते हुए तारा का दम घुट गया। तारा चुप रही।
अरे जल्दी चलो, मेरी बेटी आई है..
ताराउलझन में पड गई। बुढिया ने अपनी बेटी का जिक्र तो नहीं किया था। झोपडे में कदम रखने के बाद सामान के बक्से पर बैठी तारा को देख कर एक बार फिर तारा को आशअचर्य हुआ।
थक गई है गंगा. मैं अभी चाय बनाती हूं।
मैं तेरी चाय पीने नहीं आई। एक-दो गीत सुना दे। मैं चलूं फिर. आज देर कर दी तूने लौटने में. और ये कौन है तेरे साथ।
ये भी मेरी बिटिया है गंगा, बिल्कुल तेरी तरह. अरे, बैठ ना, तू खडी क्यों है।
अम्मा, वो नीचे कैसे बैठेगी। साडी खराब नहीं होगी उसकी। आ बहन, यहां बैठ जा तू, मैं नीचे बैठ लूं।
तारा खिजला गई। गंगा ने उसके संकोच को एकदम नंगा कर दिया था। पर गंगा पर नजर पडते ही वह अपनी खिजलाहट भूल गई। गंगा पैरों से लूली थी। अम्मा ने बताया कि वह भी कहीं खाना पकाने-परोसने का काम करती है। वहीं रहती है। असल में गंगा भागवान है, उसकी मालकिन ने गंगा के दुख की जात से अपने दुख की जात छिपाई नहीं। परोसने में देरी पर बच्चे जब गंगा पर चीखने लगते हैं तो वह खुद उठ कर खाना परोसती है। इतना ही नहीं, पढने के लिए गंगा के लिए वह नई नई किताबें भी लाकर देती हैं। गंगा का भाई मिलिट्री में सूबेदार है और इसी शहर में अपने बीबी-बच्चों के साथ रहता है। पर....
तारा को अंदर सेमानो किसीने झकझोर दिया हो। उसे अपनी बच्ची की याद आई और लगा कि घर पहुंचने में उसे देर हो रही है। बुढिया और गंगा की इजाजत लेकर वह घर की ओर चल पडी। लोकल में चढते वक्त उसका पैर एक औरत के पैर पर पडा। तारा ने सॉरी कहा तो वह औरत मुस्करा दी। तारा के होंठ भी अनजाने ही मुस्कुराहट में फैल गए। बहुत भीड थी, पर तारा जहां खडी थी वहां बैठी औरत ने तारा की थकान महसूस कर तोडी देर उसे अपनी सीट दे दी। इतनी भीड में भी बच्चे को गोद में लटकाए सौदा बेचती औरत से तारा ने अपनी बच्ची के लिए मोतियों की माला खरीदी। रेजगारी लौटाते वक्त वह औरत तारा की ओर देख कर मुस्कुराई तो ताार को लगा कि उसमें और उस औरत में एक अनजान रिशअता है।
गाडी में आज उसकी नजर ने सभी चेहरों को, सभी चाजों को टटोला। सोई बच्ची का सिर गोद में रखे सब्जी खरीदती गृहिणी, उसके सामने खडी बच्ची को निर्निमेश नजरों से देखती अविवाहिता, आंखों में आतुरता लिए किताबें संभालती हुई सपनों में खोई, बार बार खिडकी से झांकती षोडशी, नशे में दूसरों पर गिर गिर जाती मजदूरन, शराब की बदबू पर नाक सिकोडती लेकिन मजदूरन को हौले से सहारा देती उसके आसपास खडी औरतें, ट्रेन की दीवारों पर लगे पोस्टर – गर्भपात केवल 100 रुपयों में, अत्याचार के खिलाफ संगठित आवाज उठाओ, युवतियों की राज्यव्यापी परिषद, बच्चे को सही समय टीका लगाओ, जीवन बीमा निगम.....उसे लगा कि आज वह कई दिनों बाद घर लौट रही है। पुल से गुजरती ट्रेन की गुर्राहट से उसके पेट में कुछ ऊपर-नीचे हुआ, खिडकी से एक बार गंदी बू आई तो अपने आप उसकी नाक सिकुड गई, यहां तक कि ट्रेन से उतरते हुए उसने एक महिला को सुना भी दिया कि उतरनेवालों की भीड से परे होकर खडी रहो वरना उतरनेवालों की भीड तुम्हें ठेल कर नीचे ले जाएगी। ट्रेन से उतरते ही तारा के पैरों में गति आई और सधए कदमों से वह आगे चली।
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