Saturday, May 22, 2010

1. मोल लिया सिरदर्द

                                                                    -संध्या पेडणेकर
पुलिस की नौकरी में एक हवलदार को भी कितना हाजिरजवाब होना पड़ता है, कैसे कैसे पापड बेलने पड़ते हैं इसका उदाहरण था रामाचारी. उन दिनों मेरी तैनाती बेंकनहल्ली पुलिस स्टेशन में हुई थी. रामाचारी वहां हेड कांस्टेबल था. स्टेशन उसके अधीन था. छोटे गावों में हेड कांस्टेबल की भी बड़ी इज्जत होती थी उन दिनों. तिस पर रामाचारी जैसा हेड कांस्टेबल हो तो क्या कहने!

बेंकनहल्ली में उन दिनों कुल मिला कर दस लोगों का स्टाफ था. घर जैसा माहौल था. दो सालों में उस गाँव में कोई ख़ास वारदात नहीं हुई थी. स्टाफ घर से युनिफोर्म पहन कर निकलता और दफ्तर में आकर उसे खोल कर खूटी से टांग देता.

एक बार चंद्रू कांस्टेबल से मैंने इस बारे में पूछा, 'यार चंद्रू , पुलिस स्टेशन में इस तरह कच्छे-बनियान में तुम लोग बैठे रहते हो, अच्छा लगता है क्या?

तब चंद्रू ने कहा था, `क्या है साब, यहाँ गाँव में हैं कितने लोग? युनिफोर्म पहनो या न पहनो, कांस्टेबल तो कांस्टेबल ही रहेगा ना! युनिफोर्म पहनता है इसलिए कोई उसे इंस्पेक्टर नहीं बनाएगा. और नहीं पहनता इसलिए वह भंगी तो नहीं बनेगा? क्या?'

उसकी बात सुन कर क्या बोलूं मेरी समझ में नहीं आया. मैं चुप रहा तो वह बोला, `एक बात बताता हूँ आपको, वह पुलीस पाटील शिंदे है ना, उसकी बेटी की शादी में  उसने बैंक से पैसा निकाला और घर में ही रखा. रात में चोर घुस गया उसके घर. उसने हल्ला मचाया. स्टेशन में रामाचारी ड्यूटी पर था. बेचारा. तभी घर से खाना खाकर आया था. युनिफोर्म खोल कर स्टेशन में अपनी कुर्सी पर टिका ही था कि शिंदे चिल्लाता हुआ आकर खडा हो गया. रामाचारी ने आव देखा ना ताव. झट डंडा उठाया और दौड़ पडा चोर को पकड़ने के लिए. कच्छे-बनियान में रामाचारी दौड़ रहा था और आगे चोर सर पर पैर रख कर भाग रहा था. आखिर पकड़ ही लिया रामाचारी ने उसे. और ये पिटाई की कि पूछिए मत. इस पूरे चक्कर में रामाचारी के युनिफोर्म में ना होने से कोई फर्क नहीं पडा!'

जो बात चंद्रू ने कही थी वाही बात स्टाफ के अन्य लोगों ने भी कही कि युनिफोर्म में ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. इसलिए मैंने दफ्तर में भी इन सब लोगों को कच्छे बनियान में देखने कि आदत डाल ली.

एक दिन सुबह सुबह मैं ड्यूटी पर रिपोर्ट कर ही रहा था कि गाँव का एक रईस आदमी रोता-चिल्लाता आया. मुझे लगा शायद चोरों ने उसका घर लूट लिया होगा. लेकिन उस आदमी की शिकायत कुछ और ही थी. उसने कहा, `मेरा मुर्गा गुम गया है!'

मैं चुप रहा. इस बात पर कोई प्रतिक्रया देना जरूरी भी है, मुझे नहीं लगा. लेकिन वह आदमी बड़ा दुखी था. कहने लगा, `मेरे मुर्गे जैसा कोई मुर्गा आसपास के गाँव में नहीं था. हर साल मुर्गों कि टक्कर में मेरा मुर्गा ही जीतता था. इसलिए सबकी नजर मेरे मुर्गे पर थी. मौक़ा पाकर आज शायद किसीने मेरा मुर्गा उड़ाया है.'

इस पर मुझे क्या कहना चाहिए मेरी समझ में नहीं आ रहा था.

कुछ देर मेरी तरफ घूर घूर कर देखने के बाद वह बिफर कर बोला, `अबे ओ हवलदार! रपट लिख!!'


मैं  भौंचक देखता रहा.इतने में हाफ्ते हुए आये रामाचारी ने उसे एक तरफ ले जाते हुए कहा, `मैं जानता हूँ क्या हुआ आपके साथ. बहुत बुरा हुआ. आपका बहुत नुक्सान हुआ होगा. आइये, मैं रिपोर्ट लिख लेता हूँ.' 

फिर रामाचारी ने एक एक बात कि तफसील से रपट लिखवा दी. उस अमीर आदमी को तसल्ली देकर घर लौटाया कि पुलिस एक दिन में उसका मुर्गा खोज कर ले आएगी. आखिर पुलिस है किस लिए? जनता के लिए ही ना? किसी का मुर्गा गुम जाए और पुलिस ढूंढ ना सके तो... लानत है ऐसी पुलिस पर!'

रामाचारी की लच्छेदार बातों से वह आदमी खुश हुआ. जाते हुए उसने सौ रुपयों का एक पत्ता रामाचारी के हाथ पर टिकाया  और कहा, `चाय पी लेना साब! मुर्गा मिलेगा तब खाना खिलाऊँगा.'

और वह चला गया. उसके जाने के बाद हर रोज कि तरह रामाचारी ने उनिफ़ोर्म खोला. अपनी जगह बैठने से पहले उसने एहतियात से सादे कागज पर लिखी रिपोर्ट को फाड़कर फ़ेंक दिया. मैंने पूछा, `वह फिर पूछने आएगा तो?'

`अरे, देंगे कोई जवाब. इतने से गाँव में उसका मुर्गा गुम कैसे जाएगा?'

मैंने पूछा, `फिर तुमने रिपोर्ट कैसे लिख दी?'

रामाचारी बोला,`वरना चाय के लिए पैसे कहाँ से मिलते? तनखा सारी तो एक तारीख को बीवी के हाथ में चली जाती है. फिर साली एक सिगरेट भी खरीदनी हो तो ऐसे ही जुगाड़ भिडाना पड़ता है.'

मैं अभी भी आशंकित था. मैंने फिर उससे पूछा, अगर वह फिर पूछने आये तो?'

रामाचारी बोला, `तुम्हें क्या लगता है? सोने की कलगी वाला था उसका मुर्गा जो हमारे ढूँढने से मिल जाएगा? आखिर उसका मुर्गा- काला, गोरा, लाल, पीला कैसा था यह हम में से देखा किसने है? अगर किसीने उड़ाया हो तो अब तक तो खा-पी कर उसे वह हजम भी कर गया होगा. बेकार की चिंता छोडो और काम में लग जाओ.'

मेरे मन का कीड़ा लेकिन सुगबुगाता ही रहा.

इस घटना को दो-चार दिन बीते होंगे. हर रोज वह अमीर आदमी पुलिस स्टेशन आता और रामाचारी उसे बहलाकर वापिस भेजता. कभी वह तुरंत मुर्गा ढूँढने के लिए उसीके साथ निकलता. नुक्कड़ तक उसे छोड़ कर फिर स्टेशन लौट आता. हर रोज वह आदमी खाने-पीने के लिए बीस-पच्चीस रूपये खुद निकाल कर रामाचारी को दे देता और  इस तरह रामाचारी की दीवाली मन रही थी. एक दिन वह आदमी जब भड़क गया तो रामाचारी चुपके से बाजार से एक तगड़ा मुर्गा ले आया. मैंने कीमत पूछी तो बोला, `पुलिसवाले से भी कोई पैसा लेता है क्या? और मैं तो ठहरा ईमानदार आदमी. कुछ देर बाद लौटाने के वायदे पर ले आया हूँ.'

`और इस मुर्गे के मालिक ने तुम्हारे वादे पर तुम्हे मुर्गा दे दिया?'

`मालिक नहीं मालकिन - गंगम्मा. बड़ी तेज औरत है. और देती क्यों नहीं? जिस दिन जरा ज्यादा हो जाती है तो रात का खाना मैं उसी की खानावली में खाता हूँ और वहीँ बरामदे में सो जाता हूँ. वह जानती है की मैं शाकाहारी हूँ. उसके मुर्गे के लिए कोई खतरा नहीं है मुझसे.'

मैंने पूछा, लेकिन, यह मुर्गा तुम लाये क्यों हो?'

उसने कहा, `देखते जाओ!'

थोड़ी ही देर में वह अमीर आदमी अपने मुर्गे के बारे में पूछताछ करने आया. रामाचारी ने बड़े प्यार से उसे बिठाया और कहा, `साब, खुशखबरी है. आपका मुर्गा मिल गया.'

वह आदमी एकदम से उछल पडा. उसने कहा, `कहाँ है? दिखाओ!'

दोनों टाँगे बांधकर मुर्गे को पुलिस स्टेशन के एक कोने में रखा हुआ था. दुबक कर बैठे मुर्गे को टांग से पकड़कर रामाचारी उठाकर लाया. मुर्गे पर नजर पड़ते ही वह आदमी चौंका. उलटे टंगे मुर्गे को गर्दन टेढ़ी कर देखते हुए वह बोला, `अरे! आखिर तुम्हे मुर्गा मिल ही गया.!!'

अब चौंकने की बारी रामाचारी की थी. मैं भी चौंक गया था. एक पल को लगा कि शायद यह आदमी खुद ही अपने मुर्गे को काट कर खा गया होगा और झूठी रपट लिखाने आ गया. लेकिन ख़ुशी में आकर रामाचारी ने कहा, `क्या, सच? आप ही का मुर्गा है ना ये?'

`तुम्हें नहीं मालूम? फिर तुमने इसे पकड़ा कैसे?' उस आदमी ने पूछा.

संभलकर रामाचारी ने कहा, `साब, झूठ  क्यों बोलूं? आपने चोरी की रपट लिखाई उसके बाद से ही मैं आपके मुर्गे के बारे में सुनता आया हूँ. मैंने खुद आपके मुर्गे को कभी देखा नहीं. आपने इतना हुबहू वर्णन किया था कि ढूंढ कर इसे पकड़ना मेरे लिए आसान हो गया. पर मन में शक तो था ही कि अगर यही आपका मुर्गा नहीं हुआ तो....आप तो नाराज हो जायेंगे मुझसे!
इसीलिए....!!!'

`अच्छा, ठीक है. यही है मेरा मुर्गा. मैं इसे ले जाता हूँ.'

रामाचारी फिर मुश्किल में आया. उसे वह मुर्गा लौटाना भी था. उसने उस आदमी से लाख कहने की कोशिश की कि अभी इस केस से संबंधीत कार्रवाई पूरी नहीं हुई है. कार्रवाई पूरी होते ही मैं खुद आपका यह मुर्गा आपके घर पहुंचा आऊँगा......' लेकिन उस आदमी ने एक नहीं मानी. कहा, कारवाई जो भी होगी वह तुम पूरी करना. और घर आकर मेरे हस्ताक्षर भी लेना.'

रामाचारी खुशामदी स्वर में बोला, `वह क्या है साहेब, इतना मुश्किल था आपके मुर्गे को ढूंढना. कित्ती मेहनत की है हम सबने मिलकर.. आप तो ऐसे ही चले जा रहे हैं....'

वह आदमी बोला, `रामाचारी, तुमने मुझे क्या पागल समझ रखा है? यह मेरा लड़नेवाला मुर्गा ना होता तो मैं इसे ढूंढवाने नहीं आता. और ना तुम्हें चाय-पानी देता रहता. जितना पैसा दे चुका हूँ उतना बहुत है.' मुर्गा उठाकर फिर वह चला गया.

लेकिन पांच मिनट के बाद फिर लौट आया और बोला, `अछा ठीक है. ये लो पांच रुपया. और, आगे भी इसी तरह काम करते रहना.' उसकी बगल मैं दब कर बैठा मुर्गा अपने को लेकर हो रहे इस पूरे मुर्गायन से बेखबर  झपकियाँ ले रहा था.

उसके जाने के बाद टेबिल पर रखा पांच रूपये का नोट उठा कर उसे उलट पुलट कर रामाचारी देखने लगा. शायद उसके दिमाग में कोई नया प्लान पैदा हो रहा था. मैंने उससे पूछा, `क्यों रामाचारी, तुम्हारे नोट की तरह यह नोट भी झूठा है क्या?'

रामाचारी ने एक लम्बी उसांस छोड़ी और कहा, `एक किस्सा ख़त्म और दूसरा किस्सा शुरू.'

मैंने पूछा, `क्या मतलब?'

वह बोला, `मतलब यही कि ये मुर्गा कम से कम तीस रुपये का था. उसे वह ले गया. अब गंगाम्मा को मैंने दो घंटे के भीतर मुर्गा नहीं लौटाया तो वह मुझे कच्चा चबा जायेगी. या तो उसका मुर्गा, या फिर उसका पैसा मुझे देना पड़ेगा. और यह आदमी तो पांच का पत्ता थमा कर चला गया. अब बाकी के पच्चीस रूपये मैं कहाँ से लाऊं?'

गंगाम्मा को रामाचारी ने कैसे लपेटा  मैं नहीं जानता क्यों कि वह अपने मुर्गे की खबर लेने पुलिस स्टेशन नहीं आयी. लेकिन दो-चार दिनों बाद वही आदमी एक बार फिर पुलिस स्टेशन आ धमका. अबकी उसके साथ हमारा सीनियर इंस्पेक्टर भी था. आसपास के पूरे गाँव में लोग उसका नाम सुन कर ही भाग खड़े होते. इसलिए नहीं कि वह बहुत कड़क था, बल्कि इसलिए कि वह गाली से बात शुरू करता और गाली पर ही ख़त्म भी करता. उसके पास एक से बढ़कर एक गालियों का भयंकर खजाना था. ऐसी गालियाँ कि शातिर से शातिर भी गश खा जाये.

आते ही वह शुरू हो गया. `....कहाँ है वह .....राम्या? .....मेरे साले को उल्लू समझ रखा है क्या? .....ने?!!!'

इसके बाद घंटे भर तक पुलिस स्टेशन नौटंकी का अड्डा बना था. गाँव के लोग भी बाहर खड़े होकर श्रवणसुख ले रहे थे. रामाचारी बीच बीच में `में में में में' कर रहा था.

आखिर किसी तरह मामला निपटा. और वे लोग चले गए. उनके जाने के बाद रामाचारी का भिन्नाना स्वाभाविक था. उस अमीर आदमी ने अपने सालेसाहब से कहा था कि उसने मुर्गा ढुंढवाने  के लिए रामाचारी को पांच सौ रुपयों की घूस दी है. इंस्पेक्टर घूस की वह रकम वापिस चाहता था. भयंकर गालियों के बीच वह रामाचारी से पांच सौ रूपये वापिस लौटाने के लिए कहता और रामाचारी तुरंत कहता, `साब, वह मुर्गा मैं किराए पर ले आया था साब, वह मुर्गा दे देना.'

मजे की बात यह थी कि उस आमिर आदमी के मुताबिक़ मुर्गा उसने अपने एक नौकर के हाथ उसी दिन, जैसे ही उसे पता चला कि वह उसका खोया हुआ मुर्गा नहीं है, पुलिस स्टेशन भेज दिया था. वह नाराज इसीलिए था कि रामाचारी ने उसके बाद आकर ना तो उससे बात की, ना ही उसका मुर्गा ढूंढ निकाला और न ही अपना मुर्गा लौटाने के लिए धन्यवाद कहा. जिस नौकर के हाथों मुर्गा भेजा गया था उसे बुलाया गया लेकिन वह किसी काम से शहर चला गया था. इसलिए मामले का तभी निपटारा नहीं हुआ. बस, रामाचारी को उस आदमी के दिए रूपये लौटाने नहीं पड़े. रामाचारी के लिए इतना काफी था.

उनके जाने के बाद रामाचारी बैठा भिन्ना रहा था.....,`....जिंदगी में पहले कभी इतनी गालियाँ नहीं खायीं मैंने.....', कसम खा खा कर वह बार बार यही कह रहा था.

अभी वह इस सदमे से निकला नहीं था कि पुलिस स्टेशन के बाहर किसी के धाड़ें मार कर रोने की आवाज सुनाई दी.`अब कौन सी नयी मुसीबत आन पड़ी?.....' कहते हुए लाठी उठा कर वह बाहर निकला. उसके पीछे पीछे हम सब लोग भी बाहर निकले.

बाहर एक किसान अपने बैल के साथ खडा था. वह इस तरह धाड़ें मार कर रो रहा था मानो उसके किसी प्रिय की अचानक मौत हो गयी हो. कभी वह अपना माथा जोर जोर से पीट रहा था, कभी बैल को मारने की मुद्रा बना रहा था. बैल निर्विकार जुगाली करता हुआ खडा था. किसान तैश में आकर उसे धक्का देता तो वह थोड़ा सा हिल भर जाता. और बस.

भिन्नाया हुआ रामाचारी दहाड़ा, `क्या तमाशा लगा रखा है? पुलिस स्टेशन है ये, तुम्हारे बाप का घर नहीं.'

किसान के कानों में रामाचारी की आवाज घुस गयी. उसने पीछे मुड कर देखा. रामाचारी के तेवर देख कर वह सहम गया. रिरियाती आवाज में बोला,`हुजूर, मैं तो लुट गया, बर्बाद हो गया. रपट लिखवानी है......'

रामाचारी दहाड़ा, `आज नहीं बे, कल आना. फुट ले यहाँ से.'  

`नहीं साब, आज आपको कम्प्लेंट लेना ही पडेगा मेरा.'

`कंप्लेंट? कैसा कंप्लेंट? किधर डाका पड़ा, चोरी हुई कि कत्ल हुआ?'

`अब क्या बताऊँ साब, चोरी ही हुई समझो!'

रामाचारी फिर दहाडनेवाला था लेकिन कांस्टेबल वीरप्पा को धाड़ें मार कर रोते उस किसान पर शायद दया आयी. उसने कहा, `मैं देखता हूँ क्या है, आप अन्दर जाइए.'

फनफनाता रामाचारी अंदर गया और धस्स से कुर्सी खिसका कर बैठ गया और उसने टेबल पर टांगें फैला लीं. वीरप्पा और उसके साथ दफ्तर के हम बाकी सभी लोग पुलिस स्टेशन की सीढियां उतर कर आये.

किसान अब सर पकड़ कर अपने बैल के पास ही जमीन पर बैठा हुआ था. वीरप्पा उसके पास जाकर बैठ गया. सहानुभूति से उसने पूछा, `सिद्रामय्या, हुआ क्या? क्यों इस तरह दिल छोटा कर रहे हो?'

सिद्रामप्पा ने आँखे उठा कर वीरप्पा को देखा. उसकी पनियाई, कीचडभरी आँखों में उदासी छाई हुई थी. रुक रुक कर वह बोला, `वीरप्पजी, मैं लुट गया.' फिर उसकी आँखों से आंसुओं की झड़ी लगी.

`क्या हुआ बताओ, किसने तुम्हें लूटा?'

सिद्रामप्पा फिर अचकचाकर उठा. हाथ कि लाठी से वह अपने बैल को अन्दाधुंद पीटने लगा. साथ ही कहता जा रहा था, `इसने....इसीने मुझे लूटा. बर्बाद कर दिया. छोडूंगा नहीं मैं इसे...'

हम सब भौंचक थे वीरप्पा ने उठकर उसका हाथ थामा. उसे एक तरफ ले गया. पानी पिलाया और पूछा कि माजरा क्या है?

किसान कि कहानी सचमुच दर्दनाक थी. उसने बताया, `पिछले चार दिनों से मैं लगातार अपनी इस बार की फसल शहर में  अढ़तिये को दे रहा था. आज आखरी खेप थी. इसलिए उसने पूरी फसल का भुगतान कर दिया. फसल डाल कर पैसे लेने में काफी देर हुई थी. इसलिए मैंने सोचा, चलते चलते रास्ते में जहां नदी पड़ती है वहीँ रोटी खा लूंगा. नोटों की गड्डी  मैंने रोटी की गठरी में ठूंस कर रख दी और चल दिया. नदी किनारे पहुँच कर मैंने रोटी की गठरी पेड़ के नीचे रखी. बैल को खोला. सोचा, हाथ-मुंह धोकर पानी लेता आऊँ फिर रोटी खाऊंगा. रोटी की गठरी वहीँ छोड़ मैं लुटिया लेकर चला. आते हुए देखता क्या हूँ, मेरे बैल ने.....मेरे अपने बैल ने रोटी की गठरी खा ली थी सरकार.... घास चरने के लिए मैंने उसे खुला छोड़ रखा था और उसने मेरी रोटियाँ ही चबा लीं. दूर से मेरी उस पर नजर पड़ी, उसके मूंह से रोटी की गठरी के कपडे का टुकडा दिखाई दे रहा था. पागल की तरह मैं दौड़ा. लेकिन मेरे पहुँचने तक देर हो गयी थी. कपडे के साथ रोटियाँ, और मेरी कड़ी मेहनत की कमाई सब इसके पेट में चला गया था......'

बोलते बोलते सिद्रामप्पा का दुःख एक बार फिर उमडा. वह फिर धाड़ें मार मार कर रोते हुए चिल्लाने लगा, `इसीने लूटा है मुझे, पकड़ लो इसे...गिरफ्तार कर लो....छोड़ना नहीं...पीट देना साब.....'

हम सब ठगे से सिद्रामप्पा के बैल की तरफ देखते रह गए. वह बेचारा एकदम निरीह लग रहा था. जुगाली कर रहे उस बैल के मुंह से झाग गिर रहा था. रुपयों का झाग कैसा होता है यह मैंने जिंदगी में पहली बार देखा.

हम सब को निस्संशय सिद्रामप्पा से सहानुभूति थी. लेकिन सवाल यह था कि अब इस पूरे माजरे का क्या किया जा सकता है? बैल ने सिद्रामप्पा के रुपये भले खाएं हों लेकिन उसे चोर करार दे कर उस पर कारवाई तो नहीं की जा सकती थी. यह बात हमने सिद्रामप्पा को समझाने की कोशिश की लेकिन वह गुस्से से बौराया हुआ था. एक ही बात की रट  लगाए जा रहा था, `बैल पर एक्शन लो!!'

और अन्दर रामाचारी भिन्नाया बैठा था.

आखिर हमने उसीसे कोई रास्ता निकालने की बिनती की.

पूरा किस्सा सुनने के बाद वह दनदनाता हुआ बाहर निकला और दहाड़ा, `कहाँ है वह एहसानफरामोश बैल? चोरी करता है? आज तक किसी जानवर ने चोरी नहीं की, इस कमीने ने की. वह भी अपने ही मालिक के घर! उसका सारा पैसा खा गया?'

फिर सिद्रामप्पा की ओर मुड कर वह बोला, `चिंता मत कर सिद्रामय्या, मैं हूँ ना! तुम्हारे इस बैल को सबक सिखाना ही पडेगा.'

फिर हमारी तरफ मुड कर रामाचारी बोला, `वीरप्पा, जाओ, ज़रा रस्सी लेकर आना. मजबूत रस्सी लाना. चोर बैल को गिरफ्तार करना है.'

रो रहे सिद्रामप्पा को अचानक झटका लगा. झटके से मानो उसके होश ठिकाने आ गए. झिझकते हुए उसने पूछा, `क...क्या करेंगे आप इसका?'

रामाचारी ने पूरे रौब के साथ कहा, `गिरफ्तार करेंगे और क्या?  तू डर मत सिद्रामय्या, मैं हूँ ना! इसे अगर छोड़ देंगे तो ये और जानवरों को भी चोरी करना सिखा देगा. इसलिए इसे सबक सिखाना जरूरी है.'

`वो ठीक है, लेकिन आप इसका करेंगे क्या?' सिद्रामप्पा जानना चाहता था.

रामाचारी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ` कुछ नहीं, इसे ऐसा पाठ पढ़ाएंगे कि जिंदगी में फिर कभी चोरी नहीं करेगा. पहले गिरफ्तार करेंगे, फिर केस कर देंगे. कोर्ट में इसे पेश करेंगे. तू गवाही देने के लिए आना. फिर जज इसे सजा सुनायेंगे. कम से कम पांच साल कि सजा होती है चोरी की. पांच साल जेल में चक्की पीसेगा, तो होश ठिकाने आ जायेंगे तेरे इस नामुराद बैल के.'

`अच्छा? वीरप्पा, इसका केस लिख लेना. और हाँ, बैल तुम्हारा ही है. इसलिए इसके चारे-पानी का खर्चा भी जमा करते जाना. मैं काम से जा रहा हूँ. वीरप्पा, अंदर से मेरी टोपी ले आना ज़रा.....' कहते हुए रामाचारी पुलिस स्टेशन के अहाते से निकल गया. वीरप्पा ने अंदर टेबिल पर पड़ी उसकी टोपी दौड़ कर उसे पकड़ा दी.

सिद्रामप्पा भौंचक खडा था. अपनी शिकायत का इसतरह उलटा असर होगा उसने शायद सोचा नहीं था. यह तो, रूपया गया, बैल जाएगा और ऊपर से दक्षिणा भी देनी पड़ेगी वाली बात हुई. अब उसके होश ठिकाने आये. उसने सोचा, बैल नहीं होगा तो अगली फसल की बुवाई कैसे होगी? सारी कमाई तो उसने उडाई ही थी, अब उस पर मुकदमा चलाने और मुकदमे के दौरान उसके खाने-पीने का खर्चा भी देना पडेगा?!

कागज लेने के लिए अंदर गए वीरप्पा के पीछे पीछे सिद्रामप्पा भागा. उसने उसके पैर पकड़ लिए. कहा, `माफ़ करना साब, गलती हुई.

वीरप्पा ने बनाते हुए कहां, `अरे, तुम क्यों माफ़ी मांग रहे हो? गलती तो तुम्हारे इस बैल ने की है.'

सिद्रामप्पा ने कहा, नहीं साब, उसने जान बूझ कर तो नहीं किया यह. गलती तो मेरी थी. मैंने यह सोचा ही नहीं कि बैल रोटी की गठरी खा सकता है! और, वह कोई रुपया रखने की जगह है? फिर.. बैल तो साब मेरा ही है, मैंने सोचा है कि.....कि उसे माफ़ ही कर दूँ. उस पर केस करूंगा तो मेरा हल कौन खींचेगा?'

फिर ये सब तुमने पहले क्यों नहीं बोला? अब साब ने कहा है केस लिखो. वो आकर पूछेंगे तो मैं क्या कहूँगा?'

`कुछ भी कहो साब, मेरे बैल को छोड़ दो. उसकी कोई गलती नहीं. मैं फिर कभी बैल की रपट लिखाने नहीं आऊँगा.'

`अछा, जा. मैं बात करता हूँ साब से.' वीरप्पा ने कहा तो कृतद्न्यताभाव से सिद्रामप्पा अपना बैल हाँक कर ले गया.

उसके जाने के बाद हमने वीरप्पा से पूछा, `अब रामाचारी पूछेगा तो क्या जवाब देगा?'

वह बोला, रामाचारी ने ही कहा था, बैल को कैद करने की बात सुन कर उसके होश ठिकाने आ जायेंगे. माफ़ी मांग लेगा तो छोड़ देना उसे.'

हम सब ने छुटकारे की सांस ली. रामाचारी की समयसूचकता के हम कायल हुए.
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5 comments:

  1. excellent story Sandhya ! keep it upload aal ur stories ! the r wonderful ....!ptherwise translate it in marathi !

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  2. Superb story, happened to read by chance
    Best of luck and regards
    Pradeep Dongre

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  3. nice story. ashachy goshti ankhi vachayala aavadtil.

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  4. Thank you Pradeep And Thank you Shripad. It takes too long to upload stories since I have little time on hand to type them out. I sure will try my best to upload them frequently.

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